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कांग्रेस कार्यालय का नहीं भाजपा को जनविरोधी नीतियों का घेराव करना चाहिए-नायक

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। कांग्रेस कार्यालय का घेराव नहीं, भाजपा को अपनी जनविरोधी नीतियों का घेराव करना चाहिए। एथेनॉल नीति से लेकर छात्रों पर लाठीचार्ज, किसानों की पीड़ा, नीट विवाद और चुनावी चंदे जैसे सवालों पर भाजपा चुप्पी साधे है। उक्त बाते विजय शंकर नायक ने 22 जुलाई को कही।

झारखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने झारखंड की राजधानी रांची के हटिया स्थित अपने कार्यालय में भाजपा द्वारा कांग्रेस कार्यालय घेरने के कार्यक्रम को राजनीतिक हताशा का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह जनता के असली मुद्दों से ध्यान हटाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि भाजपा कांग्रेस कार्यालय का घेराव कर सकती है, लेकिन देश की जनता के सवालों का घेराव कैसे तोड़ेगी? भाजपा को कांग्रेस नहीं, अपनी जनविरोधी नीतियों का जवाब देना चाहिए।

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता नायक ने कहा कि भाजपा बताए कि एथेनॉल मिश्रण नीति को लेकर उठ रहे सवालों पर उसका क्या जवाब है? छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज को लेकर उसका क्या पक्ष है? किसानों की समस्याओं और आंदोलनों पर उसकी क्या जवाबदेही है? नीट परीक्षा से जुड़े विवादों पर उसकी चुप्पी क्यों रही? और चुनावी चंदे से जुड़े गंभीर प्रश्नों पर वह स्पष्ट जवाब क्यों नहीं देती?
उन्होंने कहा कि जब भी जनता रोजगार, महंगाई, शिक्षा, किसानों और युवाओं के भविष्य पर सवाल पूछती है, भाजपा विपक्ष पर हमला कर राजनीतिक विमर्श को भटकाने का प्रयास करती है। इससे जनता के सवाल समाप्त नहीं होंगे।

नायक ने कहा कि कांग्रेस को डराने या बदनाम करने की कोशिशें पहले भी हुई हैं और आगे भी होती रहेंगी, लेकिन कांग्रेस संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जनता के अधिकारों की लड़ाई से पीछे हटने वाली नहीं है। कहा कि भाजपा जितना विपक्ष को निशाना बनाएगी, उतनी ही मजबूती से कांग्रेस जनता की आवाज़ उठाएगी। उन्होंने कहा कि देश का युवा रोजगार चाहता है, किसान सम्मानजनक आय चाहता है, छात्र निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था चाहते हैं और आम रहिवासी महंगाई से राहत चाहता है।

इन सवालों के उत्तर देने के बजाय कांग्रेस कार्यालय का घेराव करना भाजपा की राजनीतिक प्राथमिकताओं को उजागर करता है। नायक ने साफ शब्दों में कहा कि भाजपा को विरोध की राजनीति छोड़कर जवाबदेही की राजनीति करनी चाहिए। लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक होती है और जनता अब नारे नहीं, जवाब चाहती है।

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