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हरिहरनाथ एवं पातालेश्वर नाथ मंदिर में गूंजा हर-हर महादेव का नारा

ज्येष्ठ पूर्णिमा पर लाखों श्रद्धालुओं ने किया शिवालयों में जलाभिषेक

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। बिहार की पावन भूमि सदियों से तप, त्याग और अटूट लोक-आस्था की गवाह रही है। इसी गौरवशाली धार्मिक परंपरा के अंतर्गत 29 जून को ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर वैशाली और सारण जिले के सीमांत पर आस्था का एक अद्भुत महासंगम देखने को मिला। दक्षिण वाहिनी गंगा और सदा नीरा गंडकी के पवित्र जल में डुबकी लगाने के लिए तड़के सुबह से ही लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।

वैशाली जिला मुख्यालय हाजीपुर के ऐतिहासिक कौनहारा घाट, सारण जिला के हद में सोनपुर के काली घाट, पहलेजा धाम और सबलपुर के संगम घाटों पर चारों ओर केवल हर-हर गंगे और नारायण-हरि का गगनभेदी उद्घोष गूंजता रहा।
बिहार की धार्मिक मान्यताओं में ज्येष्ठ पूर्णिमा का स्थान बेहद विशिष्ट है। उदया तिथि के अनुसार, इस बार 29 जून को मनाए जा रहे इस पर्व को लेकर श्रद्धालुओं में अभूतपूर्व उत्साह दिखा। मान्यता है कि इस दिन गंगा और गंडकी के पवित्र संगम पर स्नान करने से त्रिविध तापों से मुक्ति मिलती है।

अहले सुबह से ही घाटों पर बूढ़े, बच्चे, महिलाएं और नौजवान हाथ में तिल, कुशा और जल लेकर संकल्प, तर्पण और दान-पुण्य करते नजर आए। घाटों पर कहीं सत्यनारायण भगवान की कथा का संकीर्तन हो रहा था, तो कहीं एकांत में साधक और श्रद्धालु गंडक के शांत आगोश में ध्यान मग्न दिखे।

शिवालयों में उमड़ी भीड़: हरिहर और पातालेश्वर नाथ का हुआ महा-जलाभिषेक

जानकारी के अनुसार पवित्र नदी घाटों पर स्नान के बाद आस्था की यह धारा सीधे क्षेत्र के पौराणिक शिवालयों की ओर मुड़ गई। सोनपुर स्थित विश्व प्रसिद्ध बाबा हरिहरनाथ मंदिर में हरि (विष्णु) और हर (शिव) की एक साथ उपस्थिति है, जिसके दर्शन और जलाभिषेक के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगी रहीं। भक्तों ने गंडकी का पवित्र जल बाबा हरिहरनाथ को अर्पित कर लोक-कल्याण की कामना की।

वहीं दूसरी ओर, हाजीपुर नगर के ऐतिहासिक महादेव पतालेश्वर नाथ मंदिर और नेपाली छावनी (सुवा का छावनी) स्थित शिव मंदिर में भी भक्तों का तांता लगा रहा। भूमि फाड़कर प्रकट हुए बाबा पतालेश्वर नाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए भक्तों का उत्साह देखते ही बनता था। बिल्व पत्र, धतूरा, भांग और गंध-पुष्प से महादेव का भव्य श्रृंगार किया गया।

कौनहारा और काली घाट की ओर जाने वाले रास्तों पर पारंपरिक मेले का दृश्य जीवंत हो उठा। सनातनी परंपरा के अनुसार सुहागिन महिलाओं ने घाटों पर पूजा-अर्चना की और मेले से पारंपरिक टिकली, सिंदूर, लहरिया और पूजा सामग्रियां खरीदीं। यह केवल एक धार्मिक स्नान नहीं, बल्कि बिहार की उस समृद्ध सामाजिक समरसता का प्रतीक दिखा, जहाँ हर वर्ग, हर तबका एक ही घाट पर आकर अपनी आस्था के आगे नतमस्तक हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा पर किया गया दान कभी निष्फल नहीं होता। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालुओं ने सत्तू, गुड़, वस्त्र और पंखों का दान कर अक्षय पुण्य की कामना की, जिससे जेठ की इस तपती दुपहरी में भी अध्यात्म की शीतलता पूरे क्षेत्र में व्याप्त रही।

 

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