पीयूष पांडेय/बड़बिल (ओड़िशा)। यह घटना 20 वर्ष पहले की है, जब 62 साल के प्रमोद नायक के पास कभी ओड़िशा के ब्राह्मणी नदी के किनारे कुरुंती गांव में लगभग 14 एकड़ खेती की ज़मीन थी। मॉनसून में ज़मीन पर धान और उसके बाद के महीनों में मूंग (हरा चना) और उड़द (काला चना) उगता था। आम और केले के पेड़ परिवार की आमदनी में मदद करते थे।
इलाके के कई किसानों की तरह, नायक भी सिंचाई के लिए उथले कुओं पर निर्भर थे। ब्राह्मणी से मौसमी बाढ़ समय-समय पर खेतों में नई गाद जमा कर देती थी। प्रमोद के 38 साल के पुत्र प्रवीण नायक याद करते हुए कहते हैं कि वर्ष 2005 में बाढ़ के पानी ने सब कुछ डुबो दिया था। कहा कि जब बाढ़ का पानी कम हुआ, तो उक्त ज़मीन और भी उपजाऊ हो गई।
ज्ञात हो कि, वर्ष 2008 और 2010 के बीच नायक परिवार कुरुंती और पड़ोसी गांव खड़गप्रसाद के उन सैकड़ों परिवारों में से एक था, जिन्होंने हैदराबाद के लैंको ग्रुप के प्रस्तावित थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए ज़मीन दी थी। लगभग दो दशक बाद, उनके वृद्ध माता-पिता और बेरोजगार बच्चे अपना जीवन फिर से बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जिन खेतों ने उन्हें सहारा दिया था, वे अब नहीं रहे। नौकरियों के रूप में उन्हें जो भविष्य देने का वादा किया गया था, वह कभी नहीं पुरा हो सका। इसके बजाय, उक्त परियोजना रुक गई और संचालन शुरू होने से पहले ही इसकी मशीनरी को हटा दिया गया।
ओड़िशा का ढेंकनाल देश भर में विवादित विकास के एक बहुत बड़े पैटर्न का हिस्सा रहा है। लैंड कॉन्फ्लिक्ट वॉच, एक थिंक टैंक ने अकेले अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं से संबंधित 921 से अधिक चल रहे भूमि संघर्षों का दस्तावेजीकरण किया है, जिससे 10.5 मिलियन से अधिक रहिवासी प्रभावित हुए हैं और 2 मिलियन हेक्टेयर से अधिक भूमि शामिल है।
भारत के पास पिछले दो दशकों में विकास-प्रेरित विस्थापन का कोई आधिकारिक अनुमान नहीं है। हालांकि, जानकारो का अनुमान है कि आजादी और 2000 के दशक के प्रारंभ के बीच बांधों, खदानों, उद्योगों और अन्य विकास परियोजनाओं से 50 मिलियन से 60 मिलियन देशवासी विस्थापित हुए। लैंको के लेटर में कहा गया है कि हम ऊपर बताए गए इंसानों को पावर प्लांट/कोयला खदानों/सहायक यूनिट्स के ऑपरेशनलाइज़ेशन पर सही प्लेसमेंट देने के लिए सहमत हैं, जो मार्च 2012 में होने की संभावना है। कहा गया कि कैंडिडेट को उसकी क्वालिफिकेशन, एक्सपीरियंस और डिपार्टमेंटल सिलेक्शन प्रोसेस में सही पाए जाने के आधार पर ऊपर बताए गए किसी भी डिवीज़न में सही पोजीशन पर रखा जाएगा।
स्थानीय रहिवासी प्रवीण नायक ने वर्ष 2010 में बी.टेक पूरा किया, लेकिन बेरोजगार हैं। छोटे-मोटे काम या जैसा कि वे कहते हैं कि व्यापार कर अपना गुजारा कर रहे हैं। मुआवजा काफी हद तक खत्म हो चुका है। आज, जिस जमीन के बारे में किसान कहते हैं कि उन्होंने उसे बेकार में खो दिया। उस पर जिंदल स्टील वर्क्स (जेएसडब्ल्यू) स्टील और दक्षिण कोरियाई इस्पात निर्माता कंपनी पोस्को की 35,000 करोड़ रुपये की स्टील परियोजना लगने वाली है, जो राज्य की नई भाजपा सरकार के तहत जेएसडब्ल्यू समूह द्वारा ओडिशा में व्यापक विस्तार का एक हिस्सा है। जिसमें ओड़िशा के क्योंझर, ढेंकनाल, जगतसिंहपुर और संबलपुर में लगभग एक लाख करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा।
पोस्को के साथ यह समझौता कंपनी की ओडिशा में वापसी का प्रतीक है, जब उसने जगतसिंहपुर जिले में प्रस्तावित 12 मिलियन टन की स्टील परियोजना से हाथ खींच लिया था। उक्त परियोजना जिसे वर्ष 2005 में प्रस्तावित 12 बिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश के रूप में घोषित किया गया था। भूमि अधिग्रहण पर लंबे विवादों और स्थानीय रहिवासियों के विरोध के बाद समुदायों के लिए छोड़ दी गई थी। जिन्होंने लगभग दो दशक पहले ज़मीन छोड़ दी थी, उनमें से कई के लिए इस घोषणा ने उन सवालों को फिर से खड़ा कर दिया है जो मूल प्रोजेक्ट के बंद होने के बाद भी बिना जवाब के रह गए थे।
यह विवाद सितंबर 2006 से है, जब ओडिशा सरकार ने ढेंकनाल जिले में एक थर्मल पावर प्लांट लगाने के लिए लैंको ग्रुप के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) साइन किया था। ओडिशा इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (आईडीसीओ) के ज़रिए, कुरुंती और खड़गप्रसाद गांवों में 887 एकड़ ज़मीन ली गई थी। किसानों से लिए गए प्लॉट और राज्य इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एजेंसी के ज़रिए लीज़ पर दी गई ज़मीन, फरवरी 2010 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 660 मेगावाट की दो यूनिट वाले एक प्रोजेक्ट को मंज़ूरी दी। कंस्ट्रक्शन शुरू किया गया और काफ़ी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया गया।
सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि वर्ष 2016 के आखिर तक, इस प्रोजेक्ट पर 7,400 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च हो चुके थे। वर्ष 2017 में पर्यावरण मंत्रालय को जमा किए गए डॉक्यूमेंट्स में सिविल कंस्ट्रक्शन 56 प्रतिशत और इंजीनियरिंग का काम 93 प्रतिशत पूरा किया जा सका। साथ ही इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंस्टॉलेशन भी एडवांस स्टेज पर था। कुछ मीडिया रिपोर्टिंग में अंदाज़ा लगाया गया कि काम रुकने से पहले प्रोजेक्ट का लगभग 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था। लेकिन लैंको ग्रुप की वित्तीय स्थिति तेज़ी से खराब होती गई।
अगस्त 2018 में एनसीएलटी ने लैंको इंफ्राटेक के लिक्विडेशन का ऑर्डर दिया। कुछ ही दिनों में इसकी सब्सिडियरी लैंको बाबंध पावर लिमिटेड (एलबीपीएल) के खिलाफ इन्सॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स शुरू की गईं, जिसके पास ढेंकनाल प्रोजेक्ट था। एनसीएलटी की हैदराबाद बेंच ने 27 नवंबर 2019 को एलबीपीएल के लिक्विडेशन का ऑर्डर दिया। पावर प्लांट कभी चालू नहीं हुआ।
अगस्त 2021 में 887 एकड़ ज़मीन का पार्सल इलेक्ट्रॉनिक ऑक्शन के ज़रिए बेचा गया। ऑक्शन डॉक्यूमेंट्स से पता चलता है कि अप्रैल 2020 में होने वाले ई-ऑक्शन के लिए शुरू में रिज़र्व प्राइस 90 करोड़ रुपये तय किया गया था, जिसे बाद में बदलकर 100.18 करोड़ रुपये कर दिया गया। लगभग 12.5 लाख रुपये प्रति एकड़। सफल बोली लगाने वाला सैफरन रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड था, जिसने लगभग 92 करोड़ रुपये में ज़मीन खरीदी। चार साल बाद जेएसडब्ल्यू स्टील ने सैफ्रॉन रिसोर्सेज का अधिग्रहण कर लिया। जनवरी 2026 में ओडिशा सरकार ने घोषणा की कि जेएसडब्ल्यू स्टील उस स्थान पर एक ग्रीनफील्ड स्टील प्लांट स्थापित करेगी।
जब लैंको का थर्मल पावर प्लांट दिवालिया हो गया, तो उसने अपने पीछे टूटी हुई आजीविका का एक निशान छोड़ दिया। स्थानीय रहिवासी जिन्होंने ठेकेदारों, आपूर्तिकर्ताओं और मजदूरों के रूप में अपनी बचत का निवेश एक ऐसे प्रोजेक्ट पर किया था जो लगभग 80 प्रतिशत पूरा हो चुका था, उन्हें न तो काम मिला और न ही सहारा। जिस जमीन पर उन्होंने निर्माण में मदद की थी, उसे चुपचाप नीलाम कर दिया गया और अंतिम बिक्री मूल्य का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं था।
जैसे-जैसे काम आगे बढ़ा जैसा कि स्थानीय रहिवासियों का कहना है कि उन्होंने उपकरण, सामग्री और परिवहन में पर्याप्त रकम का निवेश करते हुए मैन पावर, विद्युत और यांत्रिक सेवाएं प्रदान की। अधिकांश निर्माण गतिविधि स्थानीय श्रमिकों और व्यवसायों पर निर्भर थी। इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंस्टॉलेशन भी एडवांस स्टेज में थे। प्लांट की मशीनरी और इक्विपमेंट भी लिक्विडेशन प्रोसेस के दौरान बेचे गए। नीलामी के डॉक्यूमेंट्स बताते हैं कि स्क्रैप के तौर पर मशीनरी और इक्विपमेंट की बिक्री से 200 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कमाई हुई होगी, जिसमें प्रोजेक्ट साइट पर लगाए गए इक्विपमेंट के साथ-साथ वित्तीय वर्ष 2020-21 के दौरान ओडिशा के पारादीप और आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम पोर्ट पर पड़ी इम्पोर्टेड मशीनरी भी शामिल है।
रिकॉर्ड्स आगे बताते हैं कि लैंको की सब्सिडियरी कंपनी द्वारा पारादीप पोर्ट के ज़रिए इम्पोर्ट किए गए इक्विपमेंट को जेएसडब्ल्यू ग्रुप की एक दूसरी कंपनी जिंदल स्टील ने 27 अगस्त 2021 को आयोजित एक ई-ऑक्शन के ज़रिए खरीदा था। ज़मीन और इक्विपमेंट की बिक्री से मिली रकम का इस्तेमाल क्रेडिटर्स को चुकाने में किया गया।
दिसंबर 2022 में प्रोजेक्ट की 265 मीटर की चिमनी जो अधूरे प्लांट के आखिरी दिखने वाले अवशेषों में से एक थी, को एक थर्ड-पार्टी कॉन्ट्रैक्टर ने गिरा दिया था। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को लिखे एक पत्र में किसानों के संगठन आंचलिका शिल्पंचला ख्यातिग्रस्थ प्रजासंघ ने कहा कि स्थानीय ठेकेदारों, आपूर्तिकर्ताओं और श्रमिकों को परियोजना के लिए प्रदान की गई सेवाओं के लिए 250 करोड़ रुपये से 300 करोड़ रुपये के बीच बकाया है।
नीलामी के दस्तावेज़ों से पता चलता है कि अप्रैल 2020 में होने वाली ई-नीलामी के लिए 887 एकड़ ज़मीन का रिज़र्व प्राइस (न्यूनतम कीमत) शुरू में 90 करोड़ रुपये तय किया गया था। अप्रैल 2021 तक, यह रिज़र्व प्राइस बढ़ाकर 100.18 करोड़ रुपये, यानी लगभग 12.5 लाख रुपये प्रति एकड़ कर दिया गया था। किसी भी सार्वजनिक दस्तावेज़ में उस रिज़र्व प्राइस का ज़िक्र नहीं है जिस पर अगस्त 2021 में आखिरकार यह ज़मीन बेची गई।
प्रस्तावित स्टील प्रोजेक्ट ने इस बात की ओर ध्यान खींचा है कि ज़मीन मूल प्रोजेक्ट कंपनी, लैंको से इसके मौजूदा मालिकों के पास कैसे पहुँची। रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज़ में जमा जानकारी के अनुसार, सैफ़्रॉन रिसोर्सेज़ को दिसंबर 2014 में एक लाख रुपये की पेड-अप कैपिटल के साथ शुरू किया गया था। कंपनी के रिकॉर्ड बताते हैं कि जेएसडब्ल्यू स्टील द्वारा अधिग्रहण किए जाने से पहले के तीन वित्तीय वर्षों में इसका कोई टर्नओवर नहीं था। इसकी मुख्य संपत्ति 887 एकड़ ज़मीन थी जिसे दिवालियापन की नीलामी के ज़रिए हासिल किया गया था।
जुलाई 2025 में स्टॉक एक्सचेंज में दी गई जानकारी में जेएसडब्ल्यू स्टील ने बताया कि उसने 679.34 करोड़ रुपये की एंटरप्राइज़ वैल्यू पर सैफ़्रॉन रिसोर्सेज़ का अधिग्रहण किया था। तब से यह ट्रांज़ैक्शन स्थानीय रहिवासियों और मूल प्रोजेक्ट के लिए ज़मीन गंवाने वाले परिवारों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक फ़ोरम की शिकायतों का केंद्र बन गया है।
जनवरी 2026 में सेबी को भेजे गए मौजूदा एक पत्र में फ़ोरम ने आरोप लगाया है कि दिवालियापन की कार्यवाही के दौरान ज़मीन को मौजूदा बाज़ार भाव से बहुत कम कीमत पर बेचा गया था। फ़ोरम का दावा था कि असल बिक्री कीमत लगभग 10 लाख रुपये प्रति एकड़ थी। तर्क दिया गया कि उस समय इस इलाके में औद्योगिक ज़मीन की कीमत इससे कहीं ज़्यादा थी। आर्टिकल 14 इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका।
सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत वर्ष 2021 की नीलामी के बारे में जानकारी, जिसमें बोली लगाने वालों की संख्या और प्रतिस्पर्धी बोलियाँ शामिल थी। मांगने वाली एक अर्ज़ी को एनसीएलटी ने खारिज कर दिया। एनसीएलटी ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही से जुड़ी जानकारी अदालत के नियमों में बताई गई प्रक्रियाओं के ज़रिए ही हासिल की जा सकती है। नीलामी के बारे में सार्वजनिक रूप से जानकारी न होना, ग्रामीणों और ज़मीन गंवाने वाले रहिवासियों द्वारा उठाए गए मुख्य मुद्दों में से एक बन गया है।
आर्टिकल 14 ने बीते माह 28 मई को जेएसडब्ल्यू स्टील के चेयरमैन सज्जन जिंदल, पोस्को के प्रतिनिधियों और आईडीसीओ के सीनियर अधिकारियों (जिनमें चेयरपर्सन उषा पाधी और मैनेजिंग डायरेक्टर डी. प्रशांत कुमार रेड्डी शामिल हैं) को ईमेल के ज़रिए सवाल भेजे थे। उपरोक्त कंपनियों और अधिकारियों से ज़मीन की कीमत, सैफ्रॉन रिसोर्सेज़ के अधिग्रहण, ज़मीन के कुछ हिस्सों से जुड़ी लीज़ की शर्तों का पालन करने और बाद में हुए ट्रांसफर के लिए मिली मंज़ूरी के बारे में पूछा गया था। खबर छपने के समय तक कोई जवाब नहीं मिला।
बीते माह 28 मई को आर्टिकल 14 ने आईडीसीओ से पूछा कि क्या इन शर्तों का पालन किया गया था और क्या तय समय-सीमा के अंदर कंस्ट्रक्शन आगे नहीं बढ़ने पर कोई रिव्यू किया गया था। कोई जवाब नहीं आया। कई दावेदार ज़मीन मालिकों ने ओडिशा हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है, जिसमें एक ऐसे प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहित ज़मीन को वापस लेने की मांग की गई है जो अबतक पूरा ही नहीं किया गया है।
इस वर्ष जनवरी में कोर्ट ने एक पिटीशन का निपटारा किया, जिसमें यह दर्ज किया गया था कि पिटीशनर्स ने डिस्ट्रिक्ट अथॉरिटीज़ को रिप्रेजेंटेशन दिया था, जिसमें कहा गया था कि असली प्रोजेक्ट से जुड़े कमिटमेंट्स पूरे नहीं हुए थे। मई में कोर्ट ने ज़मीन मालिकों और डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन के बीच बातचीत के लिए और समय दिया।
प्रस्तावित स्टील प्रोजेक्ट के पास के गांवों के रहिवासियों ने भी इसके एनवायरनमेंट पर असर के बारे में चिंता जताई है। खासकर ब्राह्मणी नदी के पास होने को देखते हुए ओडिशा की दूसरी सबसे बड़ी नदी, जो शंख और साउथ कोयल नदियों के संगम से बनती है। पास के गांव कुरुंती के 62 साल के रबी नारायण नायक ने भी ऐसी ही चिंता जताई। उनके परिवार की 3.74 एकड़ खेती की ज़मीन चली गई। उन्होंने अधिग्रहण की प्रक्रिया में कई कमियों का आरोप लगाया, लेकिन गांव वालों ने आखिरकार नौकरियों के वादों और प्रोजेक्ट से होने वाले बड़े विकास की उम्मीद के कारण मान लिया। नायक ने भी आरोप लगाया कि जब खेत अधिग्रहित किए गए तो असेसमेंट कभी ठीक से नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि हमारे पुश्तैनी खेत पर पेड़ थे और एक कुआं था, जिसे मैंने सिंचाई विभाग से पैसे की मदद से खोदा था।
कहा कि ज़मीन अधिग्रहण के समय इन बातों का ध्यान नहीं रखा गया। उन्होंने कहा कि जिन प्राइवेट कंपनियों ने लगातार ज़मीन पर मालिकाना हक का दावा किया है, वे अमीर हैं। जिन्हें परवाह है कि जिनकी ज़मीन चली गई, वे ज़िंदा रहें या मर जाएं? ओड़िशा सरकार को प्राइवेट कम्पनियों को जमीन आवंटन से पहले ग्रामीणों के हित के विषय में सोचना चाहिए। विकास होगा तो विनाश भी होगा। अब सरकार को सोचना है कि विनाश कितना कम कैसे हो। ग्रामीणों को ज्यादा से ज्यादा लाभ कैसे मिले।
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