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बापू की प्रार्थनाओं में कृष्ण और करीम के बीच कोई दीवार नहीं थी-प्रो. मनोज झा

लोकतंत्र सिर्फ पांच साल का चुनाव नहीं, संवेदनशीलता और मूल्यों का संरक्षण है

​अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता व सांसद, प्रसिद्ध शिक्षाविद एवं प्रखर चिंतक प्रो. मनोज कुमार झा ने कहा कि बापू की प्रार्थनाओं में कृष्ण और करीम के बीच कोई दीवार नहीं थी।

उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज जब हम स्वतंत्रता आंदोलन को याद करते हैं, तो हमें यह आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या हमारा संविधान, न्यायपालिका और लोकतंत्र उस ऐतिहासिक वादे को पूरा कर पा रहे हैं? यदि हम बेरोजगारी, असमानता और विभाजनकारी राजनीति पर चर्चा नहीं कर सकते, तो स्वतंत्रता के सारे सपने अधूरे हैं।

​प्रो. मनोज कुमार झा बीते 26 अप्रैल की शाम सारण जिला के हद में शहीद महेश्वर स्मारक संस्थान सोनपुर में कविता स्मृति व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत दिवंगत कविता सिंह की जयंती पर आयोजित स्वतंत्रता आंदोलन के सपने विषय पर व्याख्यान दे रहे थे। कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सेतिका सिंह ने किया।

व्याख्यान में सांसद झा ने सामाजिक संवेदनहीनता पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज हम किसी भी जन-आंदोलन को सिर्फ ट्रैफिक जाम की दृष्टि से देखते हैं। जब अपनी वाजिब मांगों के लिए एक दिहाड़ी मजदूर सड़क पर उतरता है, तो हमें अपने ऑफिस की एक घंटे की देरी बड़ी समस्या लगती है। हम यह भूल जाते हैं कि इस राष्ट्र का निर्माण उन शहीदों के बलिदान से हुआ है, जिन्होंने अपनी उम्र का एक-चौथाई हिस्सा भी नहीं जिया था।

​लोकतंत्र की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि इसका अर्थ केवल पांच साल में एक बार चुनाव कराना नहीं है। गांधी, नेहरू और अंबेडकर ने ऐसे लोकतंत्र की कल्पना नहीं की थी जहां चुनाव के नाम पर बुनियादी मूल्यों की तिलांजलि दे दी जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि समाज में सामान्य होती जा रही घृणा और अलगाव की प्रवृत्ति से है।

प्रो. झा ने आमजनों से सजग रहने की अपील करते हुए कहा कि व्हाट्सएप पर परोसा जा रहा कंटेंट अंतिम सत्य नहीं है। वह अक्सर सत्य से बहुत दूर है। हमें अपना सत्य स्वयं ढूंढना होगा। उन्होंने सन् 1942 के अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन का स्मरण कराते हुए कहा कि बंद दरवाजे, बंद खिड़कियां और बंद दिमाग न तो समाज को बदल सकते हैं और न ही लोकतंत्र की रक्षा कर सकते हैं। दुष्यंत कुमार की पंक्तियों इस रात की दीवार को, हटा के रख दो का उद्धरण देते हुए उन्होंने कहा कि नफरत की दीवार को तोड़ने का हथौड़ा जनता के हाथ में है।

​सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से किया गया कार्यक्रम का आगाज़

कार्यक्रम की शुरुआत परिवर्तन रंग मंडली द्वारा मखदूम मोहिउद्दीन के गीत ये जंग है जंग-ए-आजादी और प्रेम धवन के ये वक्त की आवाज है मिल के चलो की प्रस्तुतियों के साथ की गयी। कार्यक्रम में रसूल मियां की रचनाओं के माध्यम से बापू की शहादत को भी याद किया गया। इस अवसर पर पूर्व आईएएस अधिकारी त्रिपुरारी शरण, प्रख्यात चिंतक अपूर्वानंद, संजीव कुमार, ज्ञानेन्द्र सिंह टुनटुन, धर्मेन्द्र सिंह मुन्ना, ब्रजेन्द्र सिंह बबलू, वरिष्ठ साहित्यकार सुरेन्द्र मानपुरी, तृप्तीनाथ सिंह, कांग्रेस नेता राम विनोद सिंह, सुनील सिंह, नगर परिषद अध्यक्ष अजय साह, अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष डॉ नवल कुमार सिंह व महासचिव अभय कुमार सिंह, अनिल सिंह, कविवर तारकनाथ सिंह, ब्रज किशोर शर्मा, अच्युत नंदन, धनंजय सिंह सहित सैकड़ों प्रबुद्ध नागरिक वृंद उपस्थित थे।

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