अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। वैशाली की जिलाधिकारी (डीएम) वर्षा सिंह ने बिहार के बच्चों, बच्चियों और युवाओं से हिन्दी पर गर्व करने का आह्वान किया।
मंत्रिमंडल सचिवालय एवं जिला प्रशासन वैशाली के संयुक्त तत्वावधान में 14 सितंबर को वैशाली जिला समाहरणालय हाजीपुर के पुष्करणी सभागार में आयोजित हिन्दी दिवस समारोह को संबोधित करते हुए डीएम सिंह ने कहा कि आज यह मानसिकता बन गई है कि अंग्रेजी बोलने से ही जीवन में आगे बढ़ा जा सकता है। जो अंग्रेजी नहीं बोल पाते, वे हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं और धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास टूटने लगता है।
उन्होंने कहा कि अंग्रेजी अच्छी है, पर अपनी बोली और अपनी भाषा बहुत अच्छी है। इसका अहसास होने पर हीनता दूर होगी। कहा कि हिन्दी के लिए ऐसी शब्दावली का प्रयोग करें कि आमजन भी कहे कि अच्छा बोला। उन्होंने युवाओं से अपील की कि आपस में हिन्दी में बातचीत करें, ताकि बाहर जाने पर कोई भी गर्व से कहें कि यह बिहार से आया है।
समारोह का उद्घाटन उन्होंने दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार सुरेन्द्र मानपुरी तथा संचालन रंगकर्मी एवं उद्घोषक बिट्ठलनाथ सूर्य ने किया। मौके पर उपस्थित साहित्यसेवियों ने एक स्वर में हिन्दी को राष्ट्रभाषा के सिंहासन पर आसीन करने का संकल्प लिया।
संगोष्ठी में साहित्यकार सुरेन्द्र मानपुरी ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में हिंदी की साहित्यिक विरासत और उसके निरंतर विकास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदी साहित्य ने समाज के विभिन्न वर्गों की भावनाओं, संघर्षों और जीवन-मूल्यों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया। कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ-साथ उसे नई दिशा देने का भी कार्य करता है। बदलते समय और तकनीकी माध्यमों के दौर में हिंदी को नई पीढ़ी की अभिव्यक्ति से जोड़ना आवश्यक है।
डॉ बबीता सिंह ने हिंदी भाषा के सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर विचार रखते हुए कहा कि हिंदी ने विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के बीच संवाद को सहज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिंदी को केवल एक विषय या भाषा के रूप में देखने के बजाय इसे हमारी संवेदनाओं, संस्कारों और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से जोड़कर समझने की आवश्यकता है। उन्होंने नई पीढ़ी में हिंदी के पठन-पाठन और साहित्य के प्रति रुचि विकसित करने पर जोर दिया।
उन्होंने कितना अनुराग भरा है दिल में, बोलूँ कैसे, तौलूँ कैसे गाकर दर्शकों को भाव विभोर कर दिया। विजय कुमार विनीत ने हिंदी की समकालीन प्रासंगिकता पर चर्चा करते हुए कहा कि संचार के साधनों में तेजी से बदलाव के बावजूद हिंदी की उपयोगिता और पहुंच लगातार बनी हुई है। डिजिटल माध्यमों, सोशल मीडिया, पत्रकारिता एवं जनसंचार के क्षेत्र में हिंदी का व्यापक प्रयोग हो रहा है। आधुनिक तकनीक और नए संचार माध्यमों के साथ हिंदी का समन्वय इसे और अधिक व्यापक एवं प्रभावशाली बना सकता है।
रविन्द्र शिखर रतन ने हिंदी की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदी साहित्य ने मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों और राष्ट्रीय चेतना को स्वर प्रदान किया है। हिंदी की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए साहित्यकारों, शिक्षकों, विद्यार्थियों और समाज के सभी वर्गों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने युवाओं को हिंदी साहित्य से जोड़ने तथा नियमित रूप से हिंदी के अध्ययन और प्रयोग को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता बताई।
मध्य विद्यालय कुतुबपुर एकारा के शिक्षक डॉ पंकज कुमार सिंह ने कहा कि हमारे मनीषियों का स्वप्न था कि हिन्दी देश को जोड़ने वाली भाषा बने। शिक्षक आलोक रंजन ने कहा कि माँ भारती के माथे का श्रृंगार है हिन्दी। शिक्षाविद शिव बालक राय ‘प्रभाकर’ ने कहा कि विदेशियों की समझ में अमीर है हिन्दी, गांधीजी के प्रयास से इसे राजभाषा का दर्जा मिला। उत्पल कांत ने कहा कि हिन्दी दुनिया में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है।
शिक्षाविद डॉ केकी कृष्णा ने कहा कि भारत है देश और हिन्दी इसकी भाषा है। गौरव कुमार झा ने गीत प्रस्तुत कर कहा कि राम और कृष्ण का देश नहीं बचेगा, हिन्दी नहीं बची तो यह देश नहीं बचेगा। नवीन कुमार ने कहा कि क्यों गालियां देकर बेचारी कहकर देती हूँ चुनौती आ बराबरी कर ले। डॉ प्रीतम कुमार ने है प्यारी हिन्दी हमारी हिन्दी, गले में हिन्दी जिसने डाला पहन कर आया विजय की माला, नंदेश्वर प्रसाद सिंह ने व्यंग्य प्रस्तुत कर कहा कि सांप बेरोजगार हो गए, जब से इंसान काटने लगे। समारोह में डॉ संजय विजित्वर, अनिल कुमार पांडेय, मनोज कुमार, डॉ वीरमणि राय, विश्वजीत कुमार, दिलीप कुमार और डॉ सुधांशु चक्रवर्ती ने भी विचार व्यक्त किए। धन्यवाद ज्ञापित जिला जन सम्पर्क अधिकारी राजेश गुप्ता ने की।
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