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अधर्म कितनी शक्तिशाली क्यों ना हो,अंततः सत्य व् धर्म की विजय होती है-मीणा महाराज

श्रीकृष्ण कथा के तीसरे दिन कंस वध, मथुरा गमन व् द्वारका लीला का वर्णन

सिद्धार्थ पांडेय/चाईबासा (पश्चिम सिंहभूम)। डॉ संत शिरोमणि स्वामी सदानंद महाराज के सानिध्य में एमआरएस श्रीकृष्ण प्रणामी सेवाधाम ट्रस्ट के तत्वावधान में झारखंड की राजधानी रांची के पुंदाग स्थित श्रीकृष्ण प्रणामी मंदिर में चार दिवसीय संगीतमय श्रीकृष्ण बीतक कथा महोत्सव का आयोजन किया गया। आयोजित कथा महोत्सव के तीसरे दिन 14 सितंबर को यहां श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास का अद्भुत वातावरण देखने को मिला।

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के धर्म नगरी वृंदावन से पधारी सुप्रसिद्ध कथा वाचिका विदुषी साध्वी मीना महाराज एवं विदुषी साध्वी पूर्णा महाराज के श्रीमुख से मधुर भजनों एवं संकीर्तन के साथ कथा का शुभारंभ किया गया। भक्ति संगीत की स्वर लहरियों से मंदिर परिसर श्रीकृष्णमय हो उठा। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालु कथा के आध्यात्मिक प्रसंगों में भाव-विभोर होकर डूबते रहे।

कथा के तीसरे दिन साध्वी मीना महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंगों का वर्णन करते हुए कंस वध, मथुरा गमन तथा द्वारका लीला के आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण का जीवन अधर्म पर धर्म की विजय, अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष और सत्य की स्थापना का दिव्य संदेश देता है। कंस वध प्रसंग का वर्णन करते हुए साध्वी ने कहा कि मथुरा का राजा कंस अत्याचार और अहंकार का प्रतीक बन चुका था।

कहा कि आकाशवाणी से यह ज्ञात होने के बाद कि देवकी का आठवां पुत्र ही उसके विनाश का कारण बनेगा, कंस ने भय और अहंकार के वशीभूत होकर अनेक अत्याचार किए। भगवान श्रीकृष्ण ने समय आने पर मथुरा पहुंचकर कंस का वध किया और उसके अत्याचार से प्रजा को मुक्ति दिलाई। यह प्रसंग संदेश देता है कि कितना भी शक्तिशाली अधर्म क्यों न हो, अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है।

मथुरा गमन का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण का गोकुल और वृंदावन से मथुरा जाना उनके जीवन की महत्वपूर्ण लीला थी। वृंदावन की प्रेममयी लीलाओं के बाद भगवान ने अपने जन्म स्थान मथुरा में अत्याचार का अंत कर धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रसंग में श्रीकृष्ण के प्रति माता यशोदा, नंद बाबा, गोप-गोपियों और ब्रजवासियों के वात्सल्य एवं प्रेम का भी भावपूर्ण वर्णन किया गया।

कथा के क्रम में द्वारका लीला का वर्णन करते हुए साध्वी मीना महाराज ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म, नीति, सुशासन और लोककल्याण की स्थापना के लिए द्वारका नगरी को अपनी कर्मभूमि बनाया। द्वारका लीला भगवान के उस स्वरूप को दर्शाती है, जिसमें वे केवल भक्तों के आराध्य ही नहीं, बल्कि कुशल मार्गदर्शक, नीति-निपुण शासक और लोक कल्याणकारी पुरुषोत्तम के रूप में भी दिखाई देते हैं।

कथा के दौरान भजनों एवं संकीर्तन की प्रस्तुति ने वातावरण को और अधिक भक्तिमय बना दिया। श्रद्धालु श्रीकृष्ण की लीलाओं का श्रवण करते हुए भाव-विभोर हो उठे और पूरा मंदिर परिसर राधे-राधे तथा जय श्रीकृष्ण के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। श्रद्धालुओं ने सामूहिक आरती की एवं प्रसाद ग्रहण किया।

ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि 15 सितंबर को कथा के अंतिम दिन उद्धव संवाद,भक्त चरित्र, समापन महाआरती एवं महाप्रसाद का आयोजन किया गया है। इस अवसर पर ट्रस्ट के अध्यक्ष डूंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, पुजारी अरविंद पांडेय, सुरेश अग्रवाल, ज्ञान प्रकाश शर्मा, संजय सर्राफ, विधा देवी अग्रवाल, बिमला जालान, संतोष देवी अग्रवाल, शोभा जालान, सरिता अग्रवाल, ललिता अग्रवाल, शकुन्तला केजरीवाल, रमा डोकानियां, उषा मोदी, नन्द रानी पाठक, रेखा पोद्दार, शीला मुरारका, रिंकु जालान, सुनीता अग्रवाल, प्रमिला पुरोहित, सुनीता देवी, आशा सिंह, गीता देवी शर्मा सहित ट्रस्ट के अन्य सदस्य एवं श्रद्धालुगण उपस्थित थे।

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