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भारतीय कृषि का मूलाधार रहे बैलों के बाजार को लगा गहरा धक्का, मेला में 10 बैल

अतीत की सुनहरी यादों में बसा सोनपुर का लोअर बैलहट्टा

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। स्वतंत्रता प्राप्ति बाद से भारतीय कृषि का मूलाधार रहे सारण जिला के विश्व प्रसिद्ध हरिहरक्षेत्र सोनपुर मेला के बैलों के बाजार को इस वर्ष गहरा धक्का लगा है। इतिहास के पन्नों को पलटिए तो कभी 52 बीघा में आबाद बैलों का बाजार इस बार लुप्त होता दिखा।

सरकारी आंकड़े को देखें तो इस बार महज 10 की संख्या में ही देशी बछौर बैल मेले में पहुंचे। बैलों की न्यून संख्या ने मेले के बैल बाजार का भविष्य तय कर दिया है। कह सकते हैं कि कभी एशिया का सबसे बड़ा बैल बाजार रहा सोनपुर मेला का लोअर बैलहट्टा अब आखिरी सांसें ले रहा है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

हालांकि इस लोअर बैलहट्टा को सरकारी शुल्क मुक्त किया जा चुका है। पर हर साल बैलों की आमद में गिरावट होती गई। कभी यह बैल बाजार बिहार भर के किसानों के लिए बैलों के खरीद -बिक्री का महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। वर्ष 1995 के सोनपुर मेले में 6 नवंबर को उद्घाटन के अवसर पर मेला के मुख्य जन सम्पर्क पंडाल के मंच पर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने लोअर बैलहट्टा में पशुओं की खरीद-बिक्री शुल्क मुक्त कर दिया था।

यह आदेश उसी वर्ष से लागू हो गया। तब लोअर बैलहट्टा की बंदोबस्ती रद्द कर जमा की गई राशि ठेकेदारों को वापस करनी पड़ी थी। तब से लोअर बैलहट्टा में पशुओं के खरीद -बिक्री को शुल्क से मुक्त रखा गया है। शुल्क मुक्त होने पर भी बैलों का आगमन नहीं होना यह संकेत है कि बैलों की जगह किसानों ने खेती के लिए ट्रैक्टरों को अपना लिया है। यहां का बैल मेला सरकारी और गैर सरकारी दो भागों लोअर बैलहट्टा और अपर बैलहट्टा के नाम से देश -दुनिया में प्रसिद्ध था। संभावना है कि आने वाले वर्षो में यह बाजार भी हाथी बाजारों की तरह इतिहास में शामिल हो जायेगा।

 

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