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मेला में राजापाकड़ के भाथा दासी कलाकारों द्वारा निर्मित कलाकृतियों की हो रही बिक्री

हरिहर क्षेत्र के आर्ट एंड क्रॉफ्ट ग्राम में सिक्की कला का अद्भुत प्रदर्शन

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में विश्व प्रसिद्ध हरिहरक्षेत्र सोनपुर मेला में पर्यटन विभाग एवं जिला प्रशासन के सौजन्य से लगाए गए आर्ट एंड क्रॉफ्ट ग्राम प्रदर्शनी में वैशाली जिला के हद में राजापाकड़ प्रखंड के भाथा दासी गांव की स्नातक छात्रा श्वेता पटेल की सिक्की कला प्रदर्शनी स्टॉल मेलार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

आर्ट एंड क्रॉफ्ट ग्राम प्रदर्शनी स्टॉल पर सिक्की से बने खूबसूरत कछुआ, मोर, मछली, चूड़ी, हेयर रिंग, फूल डाली, रोटी बॉक्स, डलिया, ईयरिंग, गोल डब्बा आदि की जमकर बिक्री की जा रही है। इनकी न्यूनतम कीमत ₹50 एवं अधिकतम ₹1500 है। अपनी माता सुनीता देवी के साथ मौजूद श्वेता ने बताया कि उसने उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान पटना से सिक्की कला का प्रशिक्षण प्राप्त किया है और उनकी माता भी प्रशिक्षित है।

सिक्की कला के बारे में श्वेता ने बताया कि यह कला अपनी अनोखी कारीगरी के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यहां के सिक्की आर्ट ने तो देश- विदेश में अपनी पहचान बना ली है। यह बहुत ही अनोखे तरह की कला है, जिसमें नेचुरल घास का इस्तेमाल कर तरह- तरह की चीजें बनाई जाती हैं। ये घास यहां प्राकृतिक तरीके से उगती है। प्राकृतिक घास का इस्तेमाल सिक्की आर्ट में किया जाता है। घास से एक से बढ़कर एक कलाकृतियां तैयार की जा रही हैं, जिनकी देश-विदेश में डिमांड है। उन्होंने बताया कि हालांकि बिहार की ये घास थोड़ी अलग होती है, तभी तो इसे गोल्डेन ग्रास ऑफ बिहार के नाम से जाना जाता है। इस घास की मदद से यहां के कारीगर जो चीजें तैयार करते हैं उसे सिक्की आर्ट कहते हैं।

क्या है सिक्की आर्ट

श्वेता के अनुसार बिहार की प्राचीन और पुरानी पारंपरिक कलाओं का शानदार नमूना है सिक्की आर्ट। इस आर्ट में सिक्की घास का इस्तेमाल किया जाता है। इस घास की सबसे खास बात क्या है जानते हैं, इसकी खेती-वेती नहीं की जाती, बल्कि यह प्राकृतिक तरीके से खुद ही उगती है। 3 से 4 फीट ऊंची यह घास नहरों और नदियों के किनारे उगती है। इस घास के तने का इस्तेमाल आर्ट में किया जाता है। वहीं जड़ों से तेल, परफ्यूम बनाया जाता है और कुछ खास तरह की दवा।

सिक्की घास की प्रोसेसिंग

कलाकृतियों में सिक्की घास के इस्तेमाल से पहले उसे प्रोसेस किया जाता है। जिसके लिए चूल्हे पर हांडी में पानी को पहले उबाला जाता है। फिर इसमें घास को डालकर कुछ देर के लिेए छोड़ दिया जाता है। जब उसकी पूरी भाप निकल जाती है, तो इसे बाहर रख दिया जाता है। उसके बाद ठंडे पानी से धोया जाता है। फिर धूप में एकदम कड़क होने तक सुखाया जाता है। इसके बाद उसे आकार दिया जाता है।

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