अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में सोनपुर में टोपो लैंड के नाम पर किए जा रहे भूमि अधिग्रहण के विरोध में किसानों द्वारा 19 मई को एक महाबैठक आयोजित की गई। बैठक में ग्रामीणों ने एक स्वर में कहा कि उनकी जमीन किसी भी परिस्थिति में टोपो लैंड की परिभाषा में नहीं आती है।
सोनपुर के आयुष गार्डन में आयोजित किसान महाबैठक में कहा गया कि वर्ष 1935 की जलधारा और 1888-89 के सर्वे नक्शे के अनुसार यह जमीन पुश्तैनी रैयतों की है। सोनपुर के आनंदपुर, बैजलपुर और कल्याणपुर जैसे गांव सैकड़ों वर्षों से बसे हैं, जहां पीढ़ियों से रहिवासी मकान बनाकर रह रहे हैं और खेती कर रहे हैं।

बैठक में वक्ताओं ने रजिस्टर-2 और रजिस्टर-डी का हवाला देते हुए अपना मजबूत दावा पेश किया। कहा कि वर्ष 1950 के बाद तैयार किए गए रजिस्टर – डी में बाय सेल और बाय परचेज का पूरा ब्योरा दर्ज है। कहा गया कि वर्ष 1956 में सरकार ने खुद किसानों को रैयत घोषित करते हुए रजिस्टर-2 तैयार किया था और सालों तक लगान (राजस्व) वसूला। किसानों ने सवाल उठाया कि अगर यह जमीन सरकारी थी, तो उन्हें रैयत घोषित कर लगान क्यों लिया गया?
किसानों ने याद दिलाया कि वर्ष 1981 में बाईपास, बांध और बिजली कार्यालय के निर्माण के लिए इसी जमीन का अधिग्रहण किया गया था, जिसका सरकार ने उचित मुआवजा भी दिया था। मुंगेर पुल निर्माण के समय भी इसी तरह भूमि अधिग्रहण कर भुगतान किया गया था। हाजीपुर के पूर्व एडीएम विनोद कुमार झा ने भी लिखित रूप से स्वीकार किया था कि यह सर्वे लैंड है, क्योंकि इसके 1889 के नक्शे, रजिस्टर-2 और मुआवजा भुगतान के रिकॉर्ड आज भी मौजूद हैं।
ऑनलाइन पोर्टल से रिकॉर्ड गायब करने का आरोप
बैठक में ग्रामीण किसानों ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि बैजलपुर से कल्याणपुर तक का रजिस्टर-डी पहले सार्वजनिक रूप से जारी हो चुका है, लेकिन अब उसे ऑनलाइन पोर्टल से गायब कर दिया गया है। यह एक सोची-समझी साजिश के तहत किया जा रहा है, ताकि किसानों के पास कानूनी सबूत न रहें। बैठक में मामले के कानूनी पहलुओं पर भी विस्तृत चर्चा की गयी। वक्ताओं ने बताया कि हाईकोर्ट के कई फैसले किसानों के पक्ष में हैं।
वर्ष 2025 में जस्टिस आशुतोष और जस्टिस पार्थिव की बेंच ने छपरा नगर निगम के खिलाफ दायर रिट और एमजेसी को स्वीकार किया था। उस समय पूरे छपरा शहर को ही टोपो लैंड घोषित कर दिया गया था, जिसे मिश्रा व् त्रिपाठी की रिट पर सुनवाई करते हुए अदालत ने स्पष्ट रूप से गलत और असंवैधानिक ठहराया था। कहा गया कि अदालत ने माना था कि जिस जमीन का नक्शा सरकार ने पास किया है, जहाँ बिजली-पानी की सरकारी सुविधाएं दी हैं और जिसका पूर्व में मुआवजा दिया जा चुका है, उसे बिना सहमति लैंड एक्विजिशन एक्ट के तहत नहीं लिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट का सुधीर वैष्णव बनाम जॉर्ज विशाखा मामले में आया हालिया फैसला भी इसी सिद्धांत को दोहराता है।
बैठक के अंत में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर तय किया गया कि सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत रजिस्टर-डी की प्रमाणित प्रति मांगी जाएगी। यदि विभाग रिकॉर्ड देने से इनकार करता है, तो पटना हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की जाएगी। साथ ही सारण जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर चेतावनी दी जाएगी कि यदि मांगें नहीं मानी गईं, तो चरणबद्ध आंदोलन तेज किया जाएगा। कहा गया कि आंदोलन को सुनियोजित रूप देने के लिए दो कमेटियां बनाई जाएंगी।

पहली कमेटी में प्रत्येक पंचायत से 4 से 6 सक्रिय सदस्यों को शामिल किया जाएगा। दूसरी लीगल कमेटी होगी, जिसमें क्षेत्र के विद्वान अधिवक्ता शामिल रहेंगे और वे कानूनी लड़ाई का जिम्मा संभालेंगे। इसके साथ ही संघर्ष समिति का एक डिजिटल ग्रुप भी बनाया गया है, जिसमें बैठक में शामिल सभी जनों के नाम और मोबाइल नंबर जोड़े जाएंगे। इस ग्रुप पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश, कानूनी तथ्य और जरूरी दस्तावेज साझा किए जाएंगे, ताकि किसान उन्हें डाउनलोड कर सुरक्षित रख सकें।
आयोजित बैठक की अध्यक्षता भाजपा दक्षिणी मंडल अध्यक्ष दीपक शर्मा एवं संचालन सुधीर सिंह टूटू ने किया। बैठक को वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ नवल सिंह, विनोद सिंह सम्राट, सुधीर सिंह टूटू, ब्रज किशोर शर्मा, जितेन्द्र सिंह, अविनाश शर्मा, दया शंकर राय, सरपंच संघ के अध्यक्ष भरत सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह टुटू, कांग्रेस नेता राम विनोद सिंह, अनिल सिंह आदि ने संबोधित किया। जबकि, अधिवक्ता अवधेश सिंह, सुरेश नारायण सिंह, मुकेश कुमार शर्मा सहित सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण रहिवासी उपस्थित थे।
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