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आत्मचिंतन और मानवता के पुनर्जागरण का दिन है कार्तिक पूर्णिमा-लक्ष्मणाचार्य

महादेव ने त्रिपुरासुर का वध कर किया था त्रिपुरारी नाम धारण

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में सोनपुर मेला के साधु गाछी स्थित श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम में 5 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रातःकाल से ही भक्तों की अपार भीड़ उमड़ी। गंगा स्नान, दीपदान, तुलसी पूजा, राधा-कृष्ण आराधना तथा गुरु नानक जयंती के पावन पर्व का दिव्य संगम इस वर्ष मंदिर परिसर में विशेष रूप से मनाया गया।

इस अवसर पर मंदिर के पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य जी महाराज ने अपने दिव्य प्रवचन में कहा कि कार्तिक पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह स्नान, दान, ध्यान और ज्ञान का महायज्ञ है। इस दिन महादेव ने त्रिपुरासुर का वध कर त्रिपुरारी नाम धारण किया था, जिससे यह दिन त्रिपुरी पूर्णिमा कहलाता है। उन्होंने कहा कि यह तिथि अंधकार पर प्रकाश, अधर्म पर धर्म और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि गंगा केवल जल नहीं, वह मोक्ष का माध्यम है। आज के दिन गंगा स्नान करने से शरीर, मन और आत्मा तीनों की शुद्धि होती है। कहा कि दान का रहस्य केवल वस्तु दान में नहीं, बल्कि अहंकार त्याग और करुणा विस्तार में है। विशेषतः अन्न, वस्त्र, दीपदान, गौदान और वृषदान का पुण्य अमर फल प्रदान करता है।

श्रीहरि ने लिया मत्स्यावतार, किया वेदों की रक्षा

स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने भगवान विष्णु और देवी तुलसी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि इस दिन श्रीहरि ने मत्स्यावतार लेकर वेदों की रक्षा की और तुलसी माता का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। कहा कि तुलसी-दल अर्पण करने से भक्तों को पापों से मुक्ति और बैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत में वर्णित रासमंडल का आरंभ भी इसी दिन हुआ था, जब श्रीकृष्ण ने राधा रानी की पूजा कर भक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया। अतः कार्तिक पूर्णिमा भक्ति और प्रेम का चरम दिवस है।

दीपदान और मानवता का संदेश

स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि दीप जलाने का अर्थ केवल बाहरी प्रकाश नहीं, बल्कि अपने अंतःकरण के अंधकार को मिटाना है। स्नान से तन शुद्ध होता है, दान से मन, ध्यान से चित्त और भक्ति से आत्मा प्रकाशित होती है। कार्तिक पूर्णिमा हमें आत्म ज्योति जगाने का सन्देश देती है। अंत में आचार्य वचन: गंगा में स्नान करो, तुलसी दल अर्पित करो, दीप जलाओ और अपने भीतर के शिव को पूजन करें। जो कार्तिक पूर्णिमा को स्नान और दान करता है, वह तीनों लोकों में पवित्र होकर परम पद को प्राप्त करता है।

देवोत्थान एकादशी से यहां हो रहे पंच दिवसीय श्रीलक्ष्मी नारायण यज्ञ का 5 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के दिन विधिवत समापन किया गया। इस अवसर पर महा भंडारा का आयोजन किया गया। इन पांच दिनों के भीतर गंगा जल अभिषेक एवं रुद्राभिषेक, तुलसी-विवाह एवं दीप महोत्सव, भजन-कीर्तन एवं प्रसाद वितरण के साथ -साथ श्रद्धालु जनों के लिए निःशुल्क भंडारा का आयोजन किया गया।
यज्ञ समापन के अवसर पर मंदिर के महंत लक्ष्मणाचार्य ने सभी श्रद्धालुओं को कार्तिक पूर्णिमा की शुभकामनाएं दीं और आह्वान किया कि यह दिन केवल पूजा का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और मानवता के पुनर्जागरण का दिन बने।

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