जहां किशन महाराज से शारदा सिन्हा तक ने बिखेरी कला की रोशनी
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। शारदीय नवरात्र के आगमन के साथ ही सारण जिला के हद में सोनपुर के सांस्कृतिक इतिहास में शहीद महेश्वर चौक स्थित नवयुवक दुर्गा पूजा समिति द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों की यादें ताजा हो जाती हैं। आठ दशक से अधिक की यह सांस्कृतिक यात्रा केवल दुर्गा पूजा आयोजन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की कला-साधना का प्रतीक रही है।
ज्ञात हो कि, इस मंच पर अपनी जीवंत प्रस्तुति से अमिट छाप छोड़ने वाले कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कलाकारों को बाद में भारत सरकार ने पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण जैसे सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा। आज यहां पूजा तो होती है, पर देवी जागरण और ख्याति प्राप्त कलाकारों के कार्यक्रमों का वह दौर थम चुका है। अब यह गौरवशाली परंपरा केवल संस्थापकों और समिति से जुड़े गणमान्य की स्मृतियों में जीवित है।
समिति की स्थापना वर्ष 1953 में जिला के हद में सवाईच ग्राम के जगदंबा स्थान में हुई थी। इसके संस्थापकों में हरेश्वर सिंह ‘मास्टर साहब’, देशबंधु तिवारी, स्व. जमुना प्रसाद, स्व. सुखदेव साह, स्व. लक्ष्मी प्रसाद जैसे धर्मानुरागी शामिल थे। शहीद महेश्वर चौक पर पंचमुखी हनुमान मंदिर के संस्थापक धनंजय सिंह ने बताया कि स्व. पृथ्वीराज सिंह, स्व. राणा मित्रजीत सिंह आदि भी आरंभ से जुड़े रहे थे।
वर्ष 1965-66 में स्व. बाबू लखनदेव सिंह के प्रस्ताव पर समिति को तत्कालीन ढाला (चौक) पर स्थानांतरित किया गया। इसी वर्ष स्व. जमुना प्रसाद के प्रस्ताव पर चौक का नामकरण शहीद महेश्वर सिंह के नाम पर किया गया।
नये स्थल पर आने के बाद अमरेन्द्र नारायण सिंह ‘बाघ वाले बच्चा बाबू’, स्व. जवाहर बाबू, रामनाथ सिंह और स्व. राजेश्वर सिंह जैसे के जुड़ने से समिति को नई मजबूती मिली।
संस्थापकों में जीवित बचे एकमात्र सदस्य 87 वर्षीय वयोवृद्ध देशबंधु तिवारी के अनुसार, प्रथम वर्ष 1,700 रुपये का चंदा प्राप्त हुआ था। उसी वर्ष स्व. नंदलाल सिंह (धनुषी, वैशाली) की कीर्तन मंडली से सांस्कृतिक कार्यक्रमों की नींव पड़ी। इसके बाद इस मंच ने जो ऊँचाई हासिल की, वह बिहार के सांस्कृतिक मानचित्र पर मील का पत्थर बन गई। यहाँ अपनी प्रस्तुति देने वाले प्रमुख कलाकारों में तबला सम्राट पंडित किशन महाराज (पद्मश्री और पद्मविभूषण), तबला वादक गोदई महाराज उर्फ पंडित सामता प्रसाद (पद्मश्री एवं पद्मभूषण), सारंगी के जादूगर उस्ताद अब्दुल लतीफ खां (पद्मश्री, बहु-वाद्य वादक), बनारस घराने के महान सारंगी वादक ‘सारंगी का जादूगर’ और ‘संगत का बादशाह’ के नाम से मशहूर गोपालजी मिश्र, पद्मश्री और ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘मोस्ट एक्सीलेंट ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर’ से सम्मानित पंडित बिरजू महाराज के वरिष्ठ शिष्य गुरु प्रताप पवार और कथक नृत्यांगना प्रिया पवार, कथक नृत्यांगना माया चटर्जी, बल्लू खां, राजेन्द्र परदेशी और उषा टंडन शामिल हैं। उपरोक्त सभी ने अपनी कला से दर्शकों को भाव-विभोर किया और यह मंच उत्तर बिहार में इस तरह के आयोजनों का इकलौता केंद्र बन गया।
अस्सी के दशक में नई पीढ़ी ने इस आयोजन को शिखर पर पहुँचा दिया। अधिवक्ता उदय प्रताप सिंह अध्यक्ष और अनिल कुमार सिंह (भारतीय स्टेट बैंक) महासचिव बने। उनके साथ सतीश कुमार सिंह, राजेन्द्र सिंह (पीएनबी), अजय कुमार सिंह, अरुण कुमार सिंह सहित रेल परिवार और गाँव के बुजुर्गों ने सक्रिय सहयोग दिया। वर्तमान में मनोज तिवारी महासचिव हैं।
उस दौर में आर. के. अरुण, डब्बू शुक्ला ऑर्केस्ट्रा, भोजपुरी गायक जोगेन्द्र सिंह ‘अलबेला’, मधुकर आनंद, गजल गायक चंदन दास, भजन सम्राट अनूप जलोटा, भोजपुरी सम्राट मुन्ना सिंह, पद्मश्री शारदा सिन्हा और वंदना वाजपेयी जैसे कलाकारों ने मंच की शोभा बढ़ाई। संस्थापक सदस्यों के अनुसार, शारदा सिन्हा के कार्यक्रम में करीब दो लाख की भीड़ उमड़ी थी, जिसे सोनपुर के इतिहास की सबसे बड़ी भीड़ बताया जाता है।
कालांतर में स्व. उमाशंकर सिंह और फिर रामविनोद सिंह ने अध्यक्ष पद संभाला, जबकि राजेन्द्र प्रसाद सिंह (पीएनबी) महासचिव बने। इस दौरान पंकज उधास, महेन्द्र कपूर और नितिन मुकेश जैसे दिग्गजों के कार्यक्रमों की योजना भी बनी, जो किन्हीं कारणों से साकार नहीं हो सकी। पटना के बड़े आयोजन आयोजक और टेंट व्यापारी भी इस समिति के सहयोगी रहे हैं। आज यह गौरवशाली कला-यात्रा लंबे विश्राम में है और एक नई पीढ़ी की प्रतीक्षा में है, जो इसके गौरवपूर्ण अतीत को पुनर्स्थापित कर सके।
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