अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम में चल रहे सात दिवसीय श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञानयज्ञ के द्वितीय दिवस पर 18 मई को भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी प्रवाहित हो उठी। पूज्य स्वामी लक्ष्मणाचार्यजी महाराज ने व्यासपीठ से श्रद्धालुओं के हृदय-पटल पर भक्ति का आलोक बिखेरते हुए शरणागति को ही परम मुक्ति का एकमात्र द्वार बताया।
इस अवसर पर स्वामी लक्ष्मणाचार्यजी महाराज ने कलियुग के प्रभाव और ईश्वर की सत्ता पर प्रकाश डालते हुए अपने संदेश में कहा कि संसार के नियमों में परिवर्तन संभव है। शास्त्र कहते हैं कि पानी मथने से मक्खन नहीं निकलता और बालू से तेल नहीं निकलता, पर कलियुग की विचित्रता में शायद यह भी संभव हो जाए। परन्तु एक सत्य सदा अटल है कि जीव का उद्धार, ईश्वर की अनन्य शरणागत के बिना कदापि संभव नहीं है।
स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि जब तक जीवात्मा मकान, दुकान, धन-दौलत और स्वजन-सम्बन्धियों के मिथ्या बल पर आश्रित रहती है, तब तक वह अहंकार में डूबी रहती है। जीवन की वास्तविक विपत्ति की घड़ी में ये सांसारिक बल निष्प्राण हो जाते हैं। जो सर्वभाव से अपना सर्वस्व प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है, वही परमात्मा का प्रिय बनता है। वह गजेन्द्र की भांति मोक्ष का अधिकारी होता है।
द्वितीय दिवस की कथा के मुख्य आकर्षण में महाराज लक्ष्मणाचार्य ने कर्दम ऋषि एवं माता देवहूति के पावन विवाह प्रसंग का श्रद्धालुओं को अत्यंत मार्मिक रसपान कराया। उन्होंने दोनों चरित्रों की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि जो अपनी समस्त इन्द्रियों को अपने वश में कर ले, वही कर्दम है। जिस सात्विक शक्ति से देवताओं का आवाहन हो सके, वह देवहूति है।

स्वामीजी ने भारतीय संस्कृति में नारी के गौरव को रेखांकित करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति में पत्नी केवल भोग्या नहीं, बल्कि धर्मपत्नी है, जो संतान प्राप्ति के पश्चात पूजनीया हो जाती है। वह जीव को भगवान से जोड़ने वाली दिव्य शक्ति है। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी का सम्बन्ध अन्योन्याश्रय है। यदि पति रथ है, तो पत्नी उसकी रथी है। दोनों मिलकर ही जीवन-यात्रा को धर्म-पथ पर ले जाते हैं। इसीलिए पत्नी के लिए एकवचन का प्रयोग शास्त्र-सम्मत नहीं है।
द्वितीय दिवस प्रतीकात्मक जयमाल उत्सव और दिव्य उल्लास
द्वितीय दिवस के कथा के दौरान जब कर्दम-देवहूति का प्रतीकात्मक विवाह और जयमाल उत्सव संपन्न हुआ, तो पूरा देवस्थानम परिसर जय श्रीकृष्ण के जयकारों से गूंज उठा। रंग-बिरंगे पुष्पों और दीपों से सजे पंडाल में मातृशक्ति ने मंगल गीतों से पूरे वातावरण को रसमय कर दिया। इस पावन वेला में मुख्य रूप से दिलीप झा, रतन कुमार कर्ण, सियामणि कुंवर, गायत्री शुक्ला, फुल झा, नीलिमा कर्ण, सुनीता सिंह, इन्दु कुमारी, पूनम चौधरी सहित अनेक श्रद्धालुओं ने कन्यादान का अलौकिक सौभाग्य प्राप्त किया। दूल्हे राजा की भव्य आरती और महाप्रसाद वितरण के साथ द्वितीय दिवस की कथा को भावपूर्ण विराम दिया गया।
सार यह कि श्रीमद्भागवत केवल श्रवण मात्र के लिए नहीं, बल्कि जीवन जीने की श्रेष्ठ कला है। जब तक मनुष्य के भीतर मैं और मेरा का अहंकार रूपी बल है, तब तक वह बंधनों में है। जिस क्षण भीतर सब कुछ तेरा का भाव जाग्रत हो जाता है, उसी क्षण मोक्ष का द्वार खुल जाता है।
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