एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। बिहार और झारखंड के बीच पिछले 25 वर्षों से चले आ रहे सोन नदी जल बंटवारे के विवाद के समाधान के बाद झारखंड को 2 मिलियन एकड़-फीट (एमएएफ) और बिहार को 5.75 एमएएफ पानी का हिस्सा निर्धारित किया गया है।
इस समझौते को दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद के समाधान के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन झारखंड के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि 2 एमएएफ पानी राज्य की वास्तविक सिंचाई, पेयजल और अन्य जल आवश्यकताओं के लिए अपर्याप्त है। उक्त बाते ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन (एआईएसएफ) के रांची जिलाध्यक्ष एहतेशाम परवीन ने एक सितंबर को कही।
एआईएसएफ जिलाध्यक्ष एहतेशाम परवीन ने कहा कि वर्ष 1973 में अविभाजित बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच सोन नदी के जल उपयोग और बाणसागर परियोजना को लेकर समझौता हुआ था। उस समय अविभाजित बिहार के हिस्से में 7.75 एमएएफ पानी निर्धारित था। वर्ष 2000 में झारखंड के गठन के बाद इसी जल हिस्से के बंटवारे को लेकर बिहार और झारखंड के बीच विवाद था, जो लगभग 25 वर्षों तक जारी रहा। उन्होंने कहा कि वर्ष 2026 के समझौते में 7.75 एमएएफ के आवंटन को इस प्रकार बांटा गया है। बिहार को 5.75 एमएएफ (लगभग 74 प्रतिशत तथा झारखंड को 2 एमएएफ (लगभग 26 प्रतिशत)।
उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार को राज्य की जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि 2 एमएएफ पानी से झारखंड में कितने हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई हो सकेगी? झारखंड के पलामू, गढ़वा और अन्य जल संकटग्रस्त क्षेत्रों को इसका कितना वास्तविक लाभ मिलेगा? इस जल आवंटन में सिंचाई और पेयजल के लिए कितना पानी उपलब्ध होगा? सूखे अथवा कम वर्षा वाले वर्षों में क्या झारखंड के 2 एमएएफ हिस्से की गारंटी बनी रहेगी? झारखंड में सोन नदी के पानी के उपयोग के लिए कितनी नहरों, जलाशयों, बांधों और सिंचाई परियोजनाओं की योजना है? क्या सरकार ने झारखंड की वर्तमान और भविष्य की जल आवश्यकता का वैज्ञानिक आकलन किया है? सोन नदी के जलग्रहण क्षेत्र में झारखंड की भौगोलिक स्थिति और उसके योगदान को जल बंटवारे में किस आधार पर शामिल किया गया है?
एहतेशाम ने कहा कि झारखंड के लिए वास्तविक चुनौती अब समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद शुरू होती है। कहा कि केवल 2 एमएएफ पानी का आवंटन हो जाना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पानी किसानों, पेयजल जरूरतों और सूखाग्रस्त क्षेत्रों तक वास्तव में पहुंचे। राज्य सरकार को समझौते की संपूर्ण शर्तें, जल उपयोग की परियोजनावार योजना तथा जिलेवार लाभ का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि राज्य का जनमानस यह समझ सके कि झारखंड को मिला 2 एमएएफ पानी राज्य की वास्तविक जरूरतों के मुकाबले कितना पर्याप्त है।
कहा कि सवाल स्पष्ट है कि झारखंड को 2 एमएएफ पानी मिला है, लेकिन क्या सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि यह पानी झारखंड की वर्तमान और भविष्य की जल आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त है? कहा कि राज्य के रहिवासियों को केवल जल आवंटन का आंकड़ा नहीं, बल्कि पानी के वास्तविक उपयोग, सिंचाई क्षेत्र, पेयजल लाभ और दीर्घकालिक जल सुरक्षा की पूरी योजना जानने का अधिकार है।
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