नव संवत्सर के राजा होंगे गुरु बृहस्पति, मंत्री होंगे मंगल-मौनी बाबा
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। आगामी 19 मार्च को रौद्र नामधारी विक्रमी हिन्दू नव संवत्सर 2083 का शुभारंभ हो रहा है। हिन्दू नव वर्ष संवत्सर के राजा देवगुरु बृहस्पति जबकि, संवत्सर के मंत्री मंगल होंगे। इस वर्ष रौद्र नाम के अनुरूप कहीं अत्यधिक गर्मी, तो कहीं भीषण बारिश या भूकंप जैसी प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना पर सकता है।
बिहार प्रदेश उदासीन महामंडल के अध्यक्ष सह सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित लोकसेवा आश्रम के संत बाबा विष्णुदास उदासीन उर्फ मौनी बाबा ने 17 मार्च को उपरोक्त जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार रौद्र संवत्सर को उग्र स्वभाव वाला माना जाता है, जिसका प्रभाव देश-दुनिया की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों पर पड़ेगा। राजा गुरु वृहस्पति के होश और मंत्री मंगल के जोश का यह मेल प्रशासनिक स्तर पर तेजी से लेकिन सोच-समझकर किए गए बदलावों को जन्म देगा।
मौनी बाबा ने बताया कि यह हिंदू नववर्ष 19 मार्च गुरुवार से शुरू होगा। उन्होंने नव संवत्सर की विशेषता बताते हुए कहा कि विक्रम संवत 2083 में 12 के बजाय 13 महीने होंगे, क्योंकि इस साल अधिमास पर रहा है। इसमें ज्येष्ठ का महीना दो बार आएगा।
राजा विक्रमादित्य ने 58 ईसा पूर्व में की थी विक्रम संवत की शुरुआत
मौनी बाबा ने बताया कि विक्रम संवत भारतीय शासक राजा विक्रमादित्य के शौर्य और विजय से जुड़ा है। इसकी शुरुआत 57 ईसा पूर्व हुई थी। कहा कि उज्जैन के इसी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने विदेशी शकों पर अपनी विजय की स्मृति में इस संवत की शुरुआत की थी। इसे मालव संवत या कृत संवत के नाम से भी संबोधित किया गया है। कहा कि ब्रह्म पुराण आदि के अनुसार इसी दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी, इसलिए इसे नव संवत्सर के रूप में मनाया जाता है।
उन्होंने बताया कि काल गणना की दृष्टि से यह कैलेंडर सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित (चन्द्र-सौर) है। इसमें साल का पहला महीना चैत्र और अंतिम महीना फाल्गुन होता है। क्रमवार चैत्र (मार्च-अप्रैल), वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष,
माघ, फाल्गुन आता है।
हिन्दू पंचांग और विक्रम संवत की गणना में होते हैं कुल 60 संवत्सर (वर्ष)
मौनी बाबा के अनुसार हिन्दू पंचांग और विक्रम संवत की गणना में कुल 60 संवत्सर (वर्ष) होते हैं, जो एक चक्र के रूप में चलते हैं। प्रत्येक संवत्सर का अपना एक विशिष्ट नाम और अर्थ (या फल) होता है। इन 60 नामों को 20-20 के तीन समूहों में बांटा गया है, जो क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिव को समर्पित हैं। इनमें प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा , श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष, चित्रभानु, स्वभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नंदन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेविलम्बी, विलम्बी, विकारी, संभावना, शार्वरी, प्लव, शुभकृत, शोभकृत, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत, परिधावी, प्रमादी, आनंद, राक्षस, अनल, पिंगल, कालयुक्त, सिद्धार्थी , रौद्र, दुर्मति, दुन्दुभी, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्षी, क्रोधन, क्षय धन है।
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