माता कुष्मांडा देवी ने की थी ब्रह्मांड की रचना
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। वासंती नवरात्र के चौथे दिन 22 मार्च को सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित बाबा हरिहरनाथ मंदिर, काली मंदिर सहित विभिन्न देवी मंदिरों में माता दुर्गा के चौथे स्वरूप आठ भुजाओं वाली माता कुष्मांडा की विधि विधान से पूजा की गयी। इन्हीं माता ने अखिल ब्रह्मांड की रचना की थी।
इस संबंध में सोनपुर स्थित सूर्य मंदिर के पुजारी पंडित अनिल झा बताते हैं कि ऋग्वेद के दशम मंडल के 125 वें सूक्त में स्वयं आदि शक्ति कहती हैं कि मैं ब्रह्मांड की अधिश्वरी हूं। अपनी इच्छा से समस्त विश्व की स्वयं रचना करती हूं। अखिल विश्व मेरी विभूति है। मुझपर किसी का प्रभुत्व नहीं। मैं आकाश और पृथ्वी से परे हूं।
उन्होंने बताया कि देवी कूष्मांडा की अपने देश में कई मंदिर हैं, जिनमें वाराणसी का दुर्गाकुंड मंदिर, कानपुर के घाटमपुर का प्रसिद्ध मंदिर शामिल हैं। अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उन्होंने उत्पन्न किया। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब कूष्मांडा देवी ने अपने ईषत् हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इन्हें सृष्टि की आदि स्वरूपा या आदि शक्ति कहा गया है। इस देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाई।
इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृति में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं, इसलिए इस देवी नाम कुष्मांडा पड़ा। इस देवी का वास सूर्य मंडल के भीतर लोक में है।
सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है। इनके ही तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है। इस अवसर पर भक्तों ने देवी मंदिरों में पवित्र मन से देवी की पूजा-आराधना की गई। कहा जाता है कि इनकी पूजा से रोगों और शोकों का नाश होता है तथा आयु, यश, बल और आरोग्य प्राप्त होता है। देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है।
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