पीयूष पांडेय/बड़बिल (ओड़िशा)। ओडिशा की ऐतिहासिक और पर्यावरण की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक दया नदी को बचाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए राज्य सरकार ने घोषणा की है कि अब से दया नदी को प्रदूषित करना आपराधिक श्रेणी में माना जाएगा। उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
यह फैसला दया नदी की बिगड़ती हालत को लेकर बढ़ती चिंता के बाद लिया गया है, जो ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर व् पुरी जिलों से होकर गुजरती है और अंततः चिल्का झील में मिल जाती है। वर्षों से बिना रोक-टोक के ठोस कचरा फेंकना, सीवरेज का निर्वहन, अतिक्रमण और अन्य मानवीय गतिविधियों ने नदी जल की गुणवत्ता और पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया है।
यह घोषणा भुवनेश्वर विकास प्राधिकरण (बीडीए) और कई सरकारी एजेंसियों द्वारा दया नदी के किनारे बड़े पैमाने पर सफाई अभियान चलाए जाने के बाद की गई। अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों, पर्यावरणविदों, स्वयंसेवकों और नदी तट से सटे स्थानीय रहिवासियों ने जमा कचरे को हटाने और नदी के आसपास के वातावरण को बहाल करने के अभियान में भाग लिया। कहा गया कि दया नदी में बिना सोचे-समझे कचरा डालने से रोकने के लिए निगरानी बढ़ाई जाएगी। साथ ही जो भी नदी का पानी गंदा करते पाए जाएंगे, उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई किए जाएंगे।
बीडीए प्रशासन ने साफ कर दिया है कि कंस्ट्रक्शन का मलबा, घर का कचरा, प्लास्टिक का कचरा, औद्योगिक क्षेत्र का कचरा या बिना ट्रीट किया हुआ गंदा पानी नदी में डालने पर क्रिमिनल केस चलेगा। अधिकारियों ने नदी के किनारों पर कब्ज़ों के खिलाफ भी चेतावनी दी है, जिससे नैचुरल चैनल छोटा हो गया है और मानसून के दौरान बाढ़ की समस्या बढ़ गई है।
ज्ञात हो कि, दया नदी का बहुत ऐतिहासिक महत्व है। इतिहास के अनुसार, इसने 2,300 साल पहले हुए खतरनाक कलिंग युद्ध को देखा था, जिसके बाद सम्राट अशोक ने हिंसा छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया था। हालांकि, आज यह नदी एक अलग लड़ाई का सामना कर रही है। शहरी प्रदूषण और पर्यावरण की अनदेखी के खिलाफ।
पर्यावरणविदों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है और कहा है कि नदी का फिर से ज़िंदा होना न सिर्फ़ बायोडायवर्सिटी के लिए, बल्कि एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील चिल्का झील की सुरक्षा के लिए भी ज़रूरी है। चिल्का झील को दया नदी से पानी मिलता है और यह हज़ारों मछुआरों और प्रवासी पक्षियों का पेट भरती है।
बीडीए प्रशासन द्वारा सफ़ाई अभियान में समुदाय की भागीदारी पर भी ज़ोर दिया गया। नदी किनारे रहने वाले रहिवासियों से कहा गया कि वे नदी को बचाने की कोशिशों की ज़िम्मेदारी लें और नदी को डंपिंग ग्राउंड के तौर पर इस्तेमाल न करें। इससे आस-पास के गांवों और शहरी बस्तियों में ज़िम्मेदारी से कचरा मैनेजमेंट को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने की उम्मीद है।
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