Advertisement

बगैर वैकल्पिक व्यवस्था किये बसे नि:सहाय परिवारों को उजाड़ना अनुचित

युवा बाहर जाकर जीने लगे आधुनिक जिंदगी, बूढ़े मां-बाप मजदूरी कर काट रहे जिंदगी

एस. पी. सक्सेना/समस्तीपुर (बिहार)। आधुनिक चकाचौंध से दूर एक बार समस्तीपुर जिला के हद में ताजपुर के चित्रसेन पोखर, मुर्गियाचक, बहादुरनगर, कस्बे आहर मुसहरी, सरसौना मुसहरी, धोबिया पोखर आदि का भ्रमण कर लीजिए। आपको निश्चित हीं विकास एवं डीजिटल युग का भ्रम दूर हो जाएगा।

यहां सरकारी, गैरमजरुआ आम, मालिक, केशरेहिंद, सड़क की जमीन आदि पर पुस्तैनी बसे दलित- गरीब- भूमिहीनों को जल, जीवन, हरियाली योजना को अमलीजामा पहनाने को सरकार के आदेश पर स्थानीय सीओ ने बसे परिवारों को उजाड़ने का नोटीस थमा दिया है। वह भी बगैर वैकल्पिक व्यवस्था किए।

इसी के मद्देनजर बसे परिवारों के बुलावे पर भाकपा माले की टीम ताजपुर प्रखंड सचिव सुरेन्द्र प्रसाद सिंह के नेतृत्व में 24 मार्च को प्रभात रंजन गुप्ता तथा मो. एजाज ने प्रखंड के सरकारी जमीन पर बसे परिवारों का जायजा लिया।

इस बावत माले नेता सुरेन्द्र प्रसाद सिंह ने बताया कि सरकारी जमीन पर बसे परिवार अत्यंत गरीब हैं। वे पुश्त- दर- पुस्त पोखर के भींडे या सरकारी जमीन पर फूस, तिरपाल, पालीथीन, एसबेस्टस आदि के मकान बनाकर रह रहे हैं।

उनके पास न तो बैठकर खाने के दाने हैं, न ही पैर में चप्पल और न ही शरीर पर सही ढंग के कपड़े। इनका जीवन यापन या तो मजदूरी से होता है या बकरी, मवेशी पालन से। इनमें से कुछ कचरे भी बुनते हैं, तो कुछ अन्य छोटे- मोटे कार्यों को कर जीवन चक्र पर बढ़ते जाते हैं। हाँ, गिने- चुने परिवारों के बच्चे बाहर में मजदूरी कर अपनी स्थिति को थोड़ा सुदृढ़ करने की कोशिश में लगे हैं।

माले नेता ने कहा कि कुछ परिवारों को शाम में ही खाना बनाते देख वे दंग रह गये। पूछने पर पता चला कि घर में रौशनी का जुगाड़ मसलन बिजली, लालटेन आदि नहीं है। कुछ परिवार के बच्चे बड़े होकर बाहर कमाने गये और वहीं रह गये। कुछ बाहर जाकर आधुनिक जीवन जीने लगे, जिन्हें अपने बुढ़े- अनपढ़ मां- पिताजी को साथ रखना नागवार गुजरता है। कई वैसे बृद्ध महिला- पुरूष आंखों में आंसू लिए आपबीती बताते हैं।

माले नेता के अनुसार ऐसे निरीह परिवारों को भी हटाने का नोटिस थमाया गया है, जिसे सरकार ने खुद पहले इंदिरा आवास, राशन कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र, बिजली, पानी, सड़क आदि सरकारी सुविधा मुहैया करा चुकी है।

बाबजूद इसकेे, बिहार सरकार बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए ऐसे नि: सहाय एवं लाचार परिवारों को हटाने का फरमान जारी कर चुकी है। स्थानीय सीओ उन्हें यहां से हटाने का नोटीस पर नोटीस जारी कर रही है। लाउडस्पीकर से प्रचार कराया जा रहा है।

रहिवासी डर के मारे अपना काम-धाम छोड़कर आधे पेट खाकर पथराई आंखों से आशा की किरण ढूंढ रहे हैं। क्या बिना वैकल्पिक व्यवस्था के इन्हें उजाड़ना उचित है? क्या मानवीय संवेदना के तहत हमें उनके पक्ष में नहीं खड़ा होना चाहिए? बड़ा सवाल है।

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *