अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। वैशाली जिला मुख्यालय हाजीपुर के सिनेमा रोड स्थित बाबू शिवजी राय मेमोरियल लाइब्रेरी के तत्वावधान में 22 अक्टूबर को साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में चुनौतियां और जिम्मेदारियां विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
क्षेत्र के शिक्षाविद और लेखक अरुण कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में आयोजित संगोष्ठी में संस्कृति कर्मी और न्यासी अध्यक्ष कुमार वीर भूषण ने विषय प्रवेश कराया। इसके बाद बुद्धिजीवियों ने अपने विचार रखे।
मौके पर शिक्षक उमेश कुमार निराला ने विषय को स्कूली शिक्षा और अभिभावकों से जोड़ते हुए आधुनिकता और संचार क्रांति को काफी हद तक जिम्मेदार बताया। लेखक, शिक्षक और रंगकर्मी डॉ सुधांशु चक्रवर्ती ने कहा कि साहित्य में संक्रमण काल जैसी स्थिति के लिए भय, नफरत और शिक्षा विरोधी राजनीतिक व्यवस्था जिम्मेदार है। कहा कि सत्ता चारों तरफ नियंत्रण की पराकाष्ठा पर है।
संगोष्ठी में वैशाली सांस्कृतिक मोर्चा के रामानंद गुप्ता ने कहा कि साजिश के तहत साहित्य की धाराओं और संस्कृति के केंद्रों तथा संस्थाओं पर प्रहार किया जा रहा है और समाज को बौद्धिकता विरोधी बनाया जा रहा है, लेकिन सृजनधर्मी भी साहस के साथ डटे हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी क्षितिज प्रकाश ने कहा कि सत्ता, न्यायालय, समाज और संगठनों में बैठा हर शीर्ष तथाकथित स्वयं को राजा या ईश्वर मान बैठा है। वह बुद्धिजीवियों और सृजनधर्मियों से डरा हुआ है, इसलिए संस्कृति पर हमलावर है।
दलित-विमर्श के चिंतक और कर्मचारी नेता घनश्याम कुमार दाहा ने कहा कि चुनौतियों के दौर में ही अच्छा साहित्यिक कर्म किया जा सकता है और वैचारिक लेखक व संस्कृतिकर्मी जान के खतरे के बावजूद आज भी ऐसा कर रहे हैं। रेलवे अधिकारी राज कुमार ठाकुर ने समाज में व्याप्त गैर-बराबरी, भेदभाव और असहिष्णुता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आने वाले दिन और भी भयावह हो सकते हैं। उन्होंने संस्कृति के वाहक विभिन्न विधाओं के अमन पसंद देशवासियों से इसके विरुद्ध अभियान चलाने का आह्वान किया।
संस्था के साहित्य सचिव, प्राध्यापक और कवि डॉ अरुण कुमार निराला ने कहा कि विभिन्न धाराओं द्वारा टकराववादी संचार के कारण संस्कृति के अर्थ ही बदल दिए गए हैं। हमें सभ्यता, परंपरा और संस्कृति के अंतर तथा साहित्य सृजन के मर्म को समझना होगा। कहा कि धैर्य के साथ इस विकट और विभत्स स्थिति से रचनाधर्मिता के बल पर ही आगे निकलना होगा। कहा कि साहित्य-संस्कृति से जुड़े देशवासियों को चुनौती को समझकर दोगुनी ताकत से अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकार करना होगा। साहित्यकार डॉ महेंद्र प्रियदर्शी ने कहा कि चुनौतियों को स्वीकार करते हुए साहित्य और संस्कृति के कार्यों में तेजी लाने की जरूरत है।
संगोष्ठी में सुरेन्द्र चौधरी, सुधीर कुमार और प्रियंका कुमारी ने भी अपने विचार रखे। अंत में प्रबंध सचिव राजेश पराशर ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कुल मिलाकर संगोष्ठी सफल तथा अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब रहा।
![]()













Leave a Reply