रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। झारखंड की धरती केवल खनिज संपदा और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि इसकी मिट्टी में हजारों वर्षों की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत भी समाई हुई है। इसी गौरवशाली विरासत का एक अनमोल अध्याय है चतरा जिला के हद में इटखोरी स्थित मां भद्रकाली मंदिर।
यह ऐसा पवित्र स्थल है, जहां आस्था के साथ इतिहास और पुरातत्व भी कदम-कदम पर दिखाई देता है। महाने और बक्सा नदी के संगम क्षेत्र में स्थित मां भद्रकाली मंदिर परिसर को सनातन, बौद्ध और जैन धर्म के संगम स्थल के रूप में जाना जाता है। यही विशेषता इस स्थान को झारखंड ही नहीं, बल्कि देश के महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों में एक अलग पहचान प्रदान करती है।
चतरा जिला मुख्यालय से यह स्थल लगभग 35 किलोमीटर पूर्व तथा जीटी रोड से जुड़े चौपारण से लगभग 16 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है मां भद्रकाली की दिव्य प्रतिमा व् मंदिर। इस मंदिर का सबसे प्रमुख आकर्षण मां भद्रकाली की प्राचीन प्रतिमा है। जिला प्रशासन के अनुसार काले पत्थर से निर्मित यह करीब पांच फीट ऊंची चतुर्भुज प्रतिमा अत्यंत आकर्षक और कलात्मक है। प्रतिमा के चरणों के नीचे ब्राह्मी लिपि में अभिलेख होने की जानकारी मिलती है, जिसे नौवीं शताब्दी के राजा महेंद्र पाल द्वितीय के समय से जोड़ा जाता है। बौद्ध परंपरा में इसी प्रतिमा को मां तारा के रूप में भी पूजा जाता है।
प्रतिमा को देखने मात्र से ही श्रद्धालुओं के मन में श्रद्धा का भाव उत्पन्न होता है। मां का स्वरूप भक्तों के लिए शक्ति, सुरक्षा और करुणा का प्रतीक है। यही कारण है कि दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालू यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और मां के चरणों में अपनी मनोकामनाएं अर्पित करते हैं।
चतरा के इटखोरी की सबसे बड़ी विशेषता यहां दिखाई देने वाला धार्मिक समन्वय है। एक ही परिसर में हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराओं से जुड़े धार्मिक प्रतीक, प्रतिमाएं और ऐतिहासिक अवशेष मिलते हैं। सनातन धर्मावलंबियों के लिए मां भद्रकाली यहां प्रमुख आराध्य देवी हैं। परिसर में सहस्र शिवलिंग महादेव की भी विशेष धार्मिक मान्यता है। बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए यह क्षेत्र भगवान बुद्ध की तपोभूमि से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का केंद्र माना जाता है। यहां मां भद्रकाली की प्रतिमा को मां तारा के रूप में पूजने की परंपरा भी बताई जाती है। वहीं, जैन धर्म में इस क्षेत्र का संबंध भगवान शीतलनाथ से जोड़ा जाता है। चतरा जिला प्रशासन के सांस्कृतिक विवरण में इटखोरी परिसर को जैन परंपरा में भगवान शीतलनाथ की जन्मभूमि की मान्यता से भी जोड़ा गया है। इस प्रकार इटखोरी धार्मिक विविधता के बीच सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक समन्वय का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।
इटखोरी नाम के पीछे की लोक कथा
इटखोरी नाम को लेकर एक बेहद प्रसिद्ध लोककथा भी प्रचलित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार युवराज सिद्धार्थ ने इस क्षेत्र में तपस्या की थी। उस समय उनकी माता उन्हें वापस ले जाने के लिए यहां पहुंचीं। लेकिन तपस्या में लीन सिद्धार्थ का ध्यान नहीं टूटा। लोक कथा के अनुसार उनकी माता के मुख से निराशा में इतखोई शब्द निकला और कालांतर में यही नाम इटखोरी के रूप में प्रचलित हो गया। यह कथा धार्मिक लोकविश्वास का हिस्सा है और आज भी स्थानीय रहिवासियों के बीच श्रद्धा के साथ सुनाई जाती है।
तपस्वी मेघा मुनि से भी जुड़ी मान्यता
मां भद्रकाली परिसर के संबंध में एक अन्य धार्मिक परंपरा तपस्वी मेघा मुनि से जुड़ी है। जिला प्रशासन के अनुसार प्राचीन काल में मेघा मुनि ने यहां तपस्या कर इस क्षेत्र को सिद्धपीठ के रूप में स्थापित किया था। इसी कारण भक्तों के बीच इस भूमि की आध्यात्मिक शक्ति को लेकर गहरी आस्था देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अलावा इस क्षेत्र को रामायण और महाभारत की कथाओं से जोड़ने वाली लोकपरंपराएं भी मौजूद हैं। भगवान श्रीराम के वनवास और पांडवों के अज्ञातवास से इस क्षेत्र के संबंध की कथाएं स्थानीय धार्मिक स्मृतियों का हिस्सा हैं। इन्हें ऐतिहासिक तथ्य के बजाय पौराणिक और लोकमान्यता के रूप में देखा जाता है।
पुरातत्व के पन्नों में छिपा गौरवशाली अतीत
मां भद्रकाली मंदिर परिसर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि पुरातत्व की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिला प्रशासन के अनुसार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की वर्ष 2011 में हुई खुदाई से इस क्षेत्र के प्राचीन महत्व से जुड़े कई पुरातात्विक तथ्य सामने आए। यहां नौवीं और दसवीं शताब्दी के मठों एवं मंदिरों के निर्माण से जुड़े प्रमाण मिलने की जानकारी दी गई है। पत्थरों को तराशकर बनाए गए प्राचीन मंदिरों के भग्नावशेष, विभिन्न प्रतिमाएं और स्थापत्य अवशेष आज भी इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की कहानी कहते हैं। मंदिर परिसर में प्राप्त पुरावशेषों को संग्रहालय में सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी की गई है।
इस दृष्टि से इटखोरी उन स्थानों में शामिल है, जहां धार्मिक आस्था और पुरातात्विक विरासत एक-दूसरे के साथ दिखाई देती हैं। मां भद्रकाली मंदिर परिसर में सहस्र शिवलिंग का भी विशेष महत्व है। सनातन धर्मावलंबियों के लिए यह स्थल भगवान शिव की आराधना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। मां भद्रकाली के दर्शन के साथ श्रद्धालु परिसर के अन्य धार्मिक स्थलों पर भी पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिर परिसर की धार्मिक विविधता ही इसे अन्य सामान्य मंदिरों से अलग पहचान देती है। इटखोरी की खूबसूरती केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र पहाड़ियों और जंगलों से पुरी तरह से घिरा है। महाने नदी के किनारे का प्राकृतिक वातावरण श्रद्धालुओं के साथ पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। मंदिर परिसर के आसपास जलाशय और हरियाली इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। जिला प्रशासन के अनुसार बिशुआ के अवसर पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालू यहां पहुंचते हैं और प्राकृतिक वातावरण का आनंद लेते हैं।
सुबह के समय मंदिर परिसर में घंटियों की आवाज, पूजा-अर्चना और आसपास का शांत वातावरण श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति कराता है। धार्मिक वातावरण के साथ प्राकृतिक शांति इस स्थान की खास पहचान बन गई है।
मां भद्रकाली मंदिर में श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं। जिला प्रशासन के सांस्कृतिक विवरण के अनुसार यहां श्रद्धालू देवी की आराधना के साथ विभिन्न धार्मिक संस्कारों के लिए भी पहुंचते हैं। नवरात्र आदि विशेष धार्मिक पर्वों और अन्य महत्वपूर्ण अवसरों पर मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। दूर-दराज से आने वाले भक्त मां के दर्शन कर परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं।
इटखोरी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को व्यापक स्तर पर सामने लाने में इटखोरी महोत्सव की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जिला प्रशासन की वेबसाइट पर राजकीय इटखोरी महोत्सव के आयोजन से संबंधित विवरण उपलब्ध है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से धार्मिक विरासत के साथ स्थानीय कला, संस्कृति और परंपराओं को भी मंच मिलता है। महोत्सव जैसे आयोजन इटखोरी को केवल तीर्थस्थल के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पर्यटन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इतिहास और पुरातत्व से जुड़े ऐसे स्थलों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनकी विरासत को सुरक्षित रखना है। मां भद्रकाली परिसर में मौजूद प्राचीन प्रतिमाएं, मंदिरों के अवशेष और अन्य पुरातात्विक सामग्री आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है। आज आवश्यकता है कि धार्मिक पर्यटन के विकास के साथ-साथ पुरातात्विक अवशेषों के संरक्षण, स्वच्छता, यात्री सुविधाओं, मार्गदर्शन व्यवस्था और ऐतिहासिक जानकारी को भी प्राथमिकता दी जाए। इससे श्रद्धालुओं के साथ देश-विदेश से आने वाले इतिहास एवं संस्कृति प्रेमी पर्यटकों को भी बेहतर अनुभव मिल सकेगा।
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