एस.पी.सक्सेना/ बोकारो। कहावत है गरीब की मेहरारू (बीबी) सबकी भौजाई (भाभी)। कोई गरीब जब समाज में अपना सम्मान पाने की ललक रखकर अपनी अहमियत दर्शाने का प्रयास करने लगता है तब समाज के कथित प्रबुद्धजन उसकी सोंच पर कुठाराघात करने में तनिक भी बिलंब नहीं करते हैं। ऐसे में उस गरिब की सोंच पर पानी फिरते देर नहीं लगता है। कहानीकार झारखंड के प्रखर राजनीतिक विश्लेषक विकास सिंह का आज का व्यंगात्मक लेख वर्तमान के अक्खड़ मेहनतकश मजदूर के आन्तरिक दर्द को बयां कर रही है:-
हमेशा उदास एवम अवसाद में रहने वाला रामलाल आज बड़े गर्व से सीना फुलाये तेजी से चला जा रहा था। मैने टोका ” कैसे हो रामलाल, बहुत दिन बाद मिल रहें हो। ..अभी उसी आरकेटी कंपनी में काम कर रहे हो न..? “अरे नहीं भैया, मैने कंपनी बदल ली। अब बिकेबी में काम करता हूँ।
“रामलाल खुशी से चहकते हुये बोला।” तब तो पगार बढ़ गयी होगी।”… मैने ज़िज्ञासावश पूछा। रामलाल ने जवाब दिया ..” नहीं भैया,..पगार तो नहीं बढ़ी लेकिन यहां थोड़ी इज्ज़त मिलती है। ” …मैने फिर पूछा ..” वो कैसे। ” रामलाल बोला ..”ऐसा है भैया कि आरकेटी में सब मुझे .”.स्साला सुअर का बच्चा ” बोलते थे, लेकिन बिकेबी में सब… ” स्साला गधे का बच्चा ” बोलते हैं।….देर हो रही है भैया, निकलता हूँ, नहीं तो मलिक पैसा काट लेगा।
यह कह कर गर्वोन्मत्त रामलाल तेजी से ..कदम कदम बढ़ाये जा खुशी के गीत गाये जा ….की तर्ज पर कदम बढ़ा दिया। रामलाल के शब्दो में आन्तरिक दर्द के साथ नये जगह में काम करने की खुशी का मिश्रित मुद्रा झलक रहा था। मुझे भी अपने मित्र रामलाल के “सुअर ” से ” गधे ” में प्रमोशन पर काफी खुशी हुयी।
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