जबतक न्याय, समानता, गरिमा व् अधिकार अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचते, तब तक संविधान दिवस सिर्फ समारोह
एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। संविधान दिवस पर 26 नवंबर को आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक द्वारा अपने विचारों से अवगत कराया गया है। उसे हू-ब-हू उसी रूप में आमजनों को उपलब्ध कराया जा रहा है। लेख में वर्णित तमाम विचार के लिए नायक स्वयं जिम्मेदार होंगे।
भारत का संविधान केवल एक कानून-पुस्तक नहीं, बल्कि यह करोड़ों उन लोगों के संघर्ष, आंसुओं और उम्मीदों का लिखित दस्तावेज है जिन्होंने सदियों तक असमानता और बहिष्कार को सहा। संविधान दिवस हमें यह याद दिलाता है कि यह देश केवल सत्ता और शासन के लिए नहीं, बल्कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए बना था।
लेकिन सच यह भी है कि संविधान के 76 वर्षों बाद भी भारत का दलित, आदिवासी, पिछड़ा और अल्पसंख्यक समाज अभी तक उन अधिकारों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया, जो कागज पर “मूल अधिकार” कहलाते हैं। इस लेख में उन अनछुए पहलुओं का भी उल्लेख है जो आज तक आम जनता की नज़र से दूर रहे—जिन्हें कभी बताया ही नहीं गया या जिन पर कभी गंभीर चर्चा नहीं हुई।
1. संविधान और हाशिए का समाज : संघर्ष की जड़ें कितनी गहरी हैं
भारत का संविधान तब लिखा गया जब देश गुलामी से निकला था, लेकिन समाज अभी भी जाति, वर्ण, और आर्थिक असमानता की जंजीरों में जकड़ा था।डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में यह स्पष्ट कहा था:“राजनीतिक समानता तभी अर्थपूर्ण होगी जब सामाजिक और आर्थिक समानता सुनिश्चित हो।”लेकिन वास्तविकता यह है कि राजनीतिक समानता मिली,सामाजिक-आर्थिक समानता अब भी अधूरी है।
2. दलित समाज के अनछुए पहलू — जिन पर अब भी मौन छाया है
(क) ‘अस्पृश्यता’ केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक हथियार भी थी बहुत कम लोगों को यह ज्ञात है कि अस्पृश्यता का सबसे बड़ा नुकसान दलितों के आर्थिक अधिकारों पर था।उन्हें खेत रखने नहीं दिए जाते थे।पशु पालने नहीं दिए जाते थे।पानी के स्रोतों पर अधिकार नहीं था। बाज़ार में व्यापार करने नहीं दिया जाता था।यह केवल सामाजिक अपमान नहीं था—यह आर्थिक गुलामी की सुविचारित व्यवस्था थी।
(ख) आज भी 60% से अधिक दलित परिवार भूमिहीन है | यह आँकड़ा बताता है कि सदियों की असमानता अभी भी खत्म नहीं हुई। (ग) संविधान की धारा 17 का उल्लंघन आज भी हजारों मामलों में दिखाई देता है | हर साल हजारों मामले “अस्पृश्यता” और “जातिगत हिंसा” के दर्ज होते हैं, लेकिन बहुत कम बातें इसे मुख्यधारा के विमर्श में आती हैं।
3. आदिवासी समाज : भारत का सबसे गलत समझा गया और सबसे धोखा खाया समुदाय भारत के आदिवासी केवल “जनजाति” नहीं हैं—वे इस भूमि के सबसे प्राचीन निवासी और असली भूमिपुत्र हैं।लेकिन अनछुए पहलू तो यह हैं:(क) आदिवासियों की 90% समस्याओं की जड़ भूमि-अधिकार का हनन है \ जंगल, पहाड़, नदी, जमीन — यह सब आदिवासी जीवन का हिस्सा है। लेकिन विकास के नाम पर उन्हें बार-बार विस्थापित किया गया। यह भारत का सबसे बड़ा, लेकिन कभी न बताया गया सच है कि—स्वतंत्र भारत में अब तक करोड़ों आदिवासी अपनी ही जमीनों से बेघर हुए,लेकिन पुनर्वास और अधिकार आज भी अधूरे हैं।
(ख) ‘पेसा’ और ‘वन अधिकार कानून’ का वास्तविक लाभ आज भी सीमित कानून है, पर लागू नहीं।हक है, पर मिल नहीं रहा।जंगल उनका था, पर मालिक कोई और बना दिया गया। 4. पिछड़ा वर्ग : संख्या में बहुसंख्यक, अधिकार में पिछड़े भारत का OBC समाज संख्या में सबसे बड़ा है, परंतु— (क) 1931 के बाद से आज तक OBC की वास्तविक जनगणना नहीं हुई यह सबसे बड़ा छुपा हुआ तथ्य है।एक लोकतंत्र में सबसे बड़े समुदाय की सही गणना न होना अपने आप में ऐतिहासिक गलती है।(ख) सरकारी नौकरियों में वास्तविक प्रतिनिधित्व अभी भी अधूरा आरक्षण है, पर लागू सीमित।
OBC वर्ग के भीतर भी तीव्र असमानता है—इसके बारे में बहुत कम चर्चा होती है। 5. अल्पसंख्यक समाज : सुरक्षा, समान अवसर और भय का अदृश्य बोझ भारत में अल्पसंख्यक नागरिकता से नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार से चिंता महसूस करते हैं।अनकही सच्चाई यह है: उन्हें शिक्षा के अवसर कम मिलते हैं।आर्थिक प्रगति में लगातार पिछड़ते जा रहे हैं |कई जगह सामाजिक दूरी और पहचान को लेकर तनाव मौजूद रहता है। 6. सबसे बड़ा अनछुआ सच : संविधान उन लोगों के लिए लिखा गया जिनकी आवाज़ नहीं थी जब संविधान लिखा गया—दलित, आदिवासी, पिछड़ा और अल्पसंख्यक समाज का प्रतिनिधित्व बहुत कम था।
लेकिन संविधान ने पहली बार उन्हें बराबरी का दर्जा दिया, अधिकार दिए,और न्याय पाने का रास्ता दिखाया।आज भी यह समाज संविधान के सबसे बड़े संरक्षक हैं, क्योंकि—उन्हीं के अधिकार सबसे अधिक खतरे में रहते हैं। 7. आज संविधान दिवस पर सबसे बड़ा प्रश्न क्या भारत ने संविधान की आत्मा को अपनाया है ? यानी—समान अवसर सामाजिक न्याय सम्मानपूर्ण जीवन बिना भेदभाव के अधिकार यदि नहीं, तो संविधान दिवस केवल एक कार्यक्रम नहीं—
एक चेतावानी है कि हमें अपने संविधान को बचाना है,केवल किताबों में नहीं, बल्कि व्यवहार में।
8. आगे का रास्ता : भारत तभी मजबूत होगा जब अंतिम व्यक्ति मजबूत होगा दलितों को गरिमा और अवसर मिलें आदिवासियों को भूमि और संस्कृति का संरक्षण मिले पिछड़ों को वास्तविक प्रतिनिधित्व मिले अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और सम्मान मिले यही संविधान की असली विजय होगी। संविधान दिवस केवल एक तारिख नहीं यह हमें दिखाता है कि भारत कितना आगे बढ़ा है,और कितना रास्ता अभी बाकी है। जब तक न्याय, समानता, गरिमा और अधिकार अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचते,संविधान दिवस सिर्फ समारोह है—और संविधान एक अधूरा सपना।
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