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लोक कवि पद्मश्री भिखारी ठाकुर की रचनाओं में समाया है पूरा हरिहर छत्तर मेला

सुप्रसिद्ध गायिका कल्पना ने दिया था चलऽ हरिहर छत्तर मेला घुमेला को अपना स्वर

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। भोजपुरी कला व् संस्कृति के शेक्सपियर लोक कवि पद्मश्री भिखारी ठाकुर और उनकी नाटक मंडली ने सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र मेला के मंच से अपने कार्यक्रमों की प्रस्तुति कर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ शंखनाद किया था। चाहे विदेशिया हो या बेटी वियोग नाटक, सभी सामाजिक संवेदनाओं से जुड़े प्रसंगों पर आधारित हैं। उन्होंने अपने इसी मेला प्रेम को अपनी रचनाओं में पिरो कर चलऽ हरिहर छत्तर मेला घुमेला और आगे की पंक्ति हरिहर नाथ दुगो हवन गुरु चाहे चेला को अमर कृति बना दिया।

असम की सुप्रसिद्ध भोजपुरी गायिका कल्पना पटवारी ने वर्ष 2022 के हरिहर क्षेत्र मेले के इस मंच से भिखारी ठाकुर के इस अमर कृति को अपनी आवाज दी थी, जिससे मेला दर्शक झूम उठे थे। आज भी कल्पना की आवाज में उनका यह मेला गीत देश और दुनिया में गूंज रहा है। भिखारी ठाकुर के गीतों में हरिहरक्षेत्र मेला के लिए हरिहर छत्तर मेला नाम का ही इस्तेमाल किया गया है। यह मेला कसमर परगना के अन्तर्गत था। इसलिए पद्मश्री भिखारी ठाकुर ने भी इसे अपने गीत हरिहर नाथ साथ एक घर में, हरदम रहत कसमर में लिखा है।

इस गीत में मेला की खूबियों – खासियतों के साथ – साथ उसकी कमियों की ओर भी समाज और सरकार का ध्यान आकृष्ट कराया गया है। स्नान घाटों की दुर्दशा का चित्रण करते हुए स्नानार्थियों को आगाह करता हुआ यह पंक्ति देखिए चलऽ हरिहर छत्तर मेला घुमेला, बहुत लोग संगम पर जाइके छपकेला। आरिये पर नेहइह ना ता गोड़ घसकेला, दया के साधु लोग आके दर्शन देला और यह व्यंग्य भी कि गंगा स्नान करने से किया हुआ सब पाप तुरंत भाग जाता है। यहां मंदिर में दोनों हरि और हर विराजमान हैं। वे एक दूसरे के गुरु हैं या चेला कहना मुश्किल है।

छोड़िकर देह पाप तुरते भागेला, हरिहर नाथ दुगो हवन गुरु चाहे चेला। और कहते हैं कि दोनों (हरि और हर) का घर एक ही है, भला उनका गुजर कैसे चलता होगा? घर बाटे एके कइसे गुजर चलेला, भितर माहीं ओड़ीयन फुल चमकेला।
यह भी कहा गया है कि टोकरी भर फूलों चढ़ाया गया है और उन पर जल अर्पण किया जा रहा है। कहते हैं कि इनके दर्शन से भक्तों का रास्ता प्रशस्त होता है। बम बम हर कहीं जल ढरकेला, दर्शन कइला से रस्ता बनेला। सुनिला जे जरल-मरल कोख पलटेला, हाजीपुर से रिबिलगंज ले धाका ठेलम ठेला। वे अपने गीतों में लिखते हैं कि हरिहर छत्तर मेला के कारण हाजीपुर से रिवीलगंज (छपरा) तक सड़कों पर भीड़ दिखाई पड़ती है। वे मेला में पाकेटमारी की ओर भी ध्यान दिलाते हुए चेताते हैं कि हाजीपुर से रिबिलगंज ले धाका ठेलम ठेला।

ओहू में चटाका बा से गेठिये काटेला, केहू लेला-देला, केहू कतहूँ रोवेला। केहू पान खाईकर हँसेलन झरेला, सुई-डोरा- ऐनक-ककही बिकेला। देखे का बहाने केहु जेबी में धरेला, हवा गाड़ी-रेल-हाथी-धोड़ा दउरेला। कहत भिखारी नाई जीव हदसेला, चलऽ हरिहर-छत्र मेला घुमेला। उन्होंने हाजीपुर में पुनर्वासी गंगा स्नान मेला का भी अपनी इस रचना में स्थान दिया है।

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