जहां होते थे भजन-कीर्तन, गूंजते थे प्रवचन, वहां अब बन चुके है मकान-दुकान
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला की आध्यात्मिक हृदय स्थली साधु गाछी, इनदिनों घोर संकट के दौर से गुजर रहा है। मेला के तपोभूमि के रूप में प्राचीन काल से ही देश और दुनिया में प्रसिद्ध नारायणी नदी किनारे अवस्थित यह संत क्षेत्र अब अपने मूल अस्तित्व में नहीं है। साधु गाछी सिकुड़ गया है।
साधु गाछी पूरी तरह रिहायशी इलाके में तब्दील होता चला जा रहा है। इस दौरान इसे रोकने में न सोनपुर वासियों ने दिलचस्पी दिखाई और न जिला प्रशासन या सरकार।
साधु-संतों की कभी चिंता की कि उनका कार्तिक पूर्णिमा स्नान के दौरान शिविर कहां लगेगा? कहां उनका प्रवचन पंडाल बनेगा और कहां उनका भंडारा चलेगा? इस पर आज तक गंभीरता से कोई पहल नहीं हो सकी, जिसके कारण अब बड़े मठों के धर्माचार्यों ने मेला क्षेत्र में अपना अपमान होने के भय से आना भी कम कर दिया है। और, जो बड़े धर्माधिकारी आए भी तो दर्शन -पूजन कर शीघ्र लौट जाते हैं।
दशकों पुर्व यहां देवोत्थान एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा पर्यन्त एक सप्ताह तक देश के विभिन्न राज्यों से आए साधु -संतों का मेला लगता था। चाहे सगुण उपासक हों या निर्गुण उपासक। सभी के शिविरों एवं पंडालों से राम नाम जप का एक ही मंत्र सर्वत्र गूंजता दिखाई पड़ता था। साधु गाछी में संतों के सानिध्य में रहने वालों को रामनाम का प्रसाद सहज ही प्राप्त होता रहता था।
ज्ञात हो कि, भारत सरकार के नमामि गंगे घाट परियोजना नहीं होता तो मेला तीर्थ यात्रियों और संतों को स्नान के लिए घाट भी नसीब नहीं होते। इन घाटों के निर्माण से तीर्थयात्री भारत वंदना घाट से किनारे – किनारे नारायणी पाथ-वे से कालीघाट, हरिहरनाथ मंदिर, गौरी शंकर मंदिर आदि सहज पहुंच जाते हैं। परंतु इस पाथ-वे के सटे पश्चिम के सभी इलाके हथसार से लेकर साधु गाछी तक धीरे -धीरे रिहायशी और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों से भरते जा रहे हैं। कहीं भी एक स्थान पर कुंभ या देश के अन्य धर्म क्षेत्रों की तरह साधु -संतों के ठहरने का अब स्थान नहीं बचा हैं। निजी रहिवासियों से जमीन लेकर प्रवचन -पंडाल लगा भजन -कीर्तन कर विदा हो जाते हैं।
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