एन. के. सिंह/फुसरो (बोकारो)। कोल इंडिया की अनुशंगी सीसीएल में कोयले की दर अप्रत्यक्ष रूप से कुछ कोलियरियों में संचालित सेल कमेटी तय करती है। लेकिन तय दर से ज्यादा मूल्य पर कोयला खरीदने वालों को कोलियरियों से कोयला उठाव में बाधा उत्पन्न किया जाता है। इस मामले में प्रबंधन मौन है। जो समझ से परे है।
इसका ताजा उदाहरण बोकारो जिला के हद में बेरमो कोयलांचल के सीसीएल ढोरी एरिया की अमलो परियोजना में देखने को मिल रहा है। यहां सेल कमेटी ने डीओ धारकों को 5900 रुपए प्रति टन की दर से कोयला उठाव तय कर दी है। इससे ज्यादा दर पर अगर कोई डीओ धारक कोयला खरीदता है, तो उसे भी सेल कमेटी की ओर से तय दर पर ही कोयला बेचने को कहा जाता है।
अन्यथा कोयला उठाव में अड़ंगा डाला जाता है। आश्चर्य यह कि इससे कंपनी को घाटा दर घाटा झेलना पर रहा है, बावजूद इसके स्थानीय सीसीएल अधिकारीयों के मुंह पर ताले लटके है। उन्हें कंपनी के घाटे से नहीं बल्कि अपनी पॉकेट की ज्यादा चिंता रहती है।
बताया जाता है कि वर्तमान में कुछ डीओ धारकों ने यहां 6230 रुपए प्रति टन दर से कोयला का डीओ लगाकर कोयला खरीदा है। लेकिन उन्हें कोयला उठाव करने में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। डीओ होल्डर ने कहा कि 22 सितम्बर से प्रतिटन 30 रूपए रेट बढ़ जायेगा। इस मामले में प्रशासन व प्रबंधन भी फेल हो चुका है। अब डीओ धारकों व सेल कमेटी के बीच गुप्त समझौता चल रहा है। इसमें डीओ धारक अपने कोयला सेल कमेटी को बेचने को तैयार हैं। जबकि सेल कमेटी अभी भी अपनी मांग पर अड़ा है।
विदित हो कि लिफ्टर राहुल कुमार को अमलो सेल कार्यालय में सेल कमिटी ने इस मामले में दबाब बनाने के लिए 11 सितंबर को मारपीट की। इसे लेकर पीड़ित राहुल ने बेरमो थाना में आवेदन भी दिया है। दूसरे पक्ष ने भी अपने बचाव के लिए बेरमो थाना में आवेदन दिया है। सूत्र बताते हैं कि सेल कमेटी डीओ धारकों को कोयला खरीद दर से 300 रुपए कम रेट देकर कोयला उठाव करने का आदेश देने को तैयार हैं। ज्यादा रेट पर डीओ लगाने पर कोयले का उठाव करने नहीं देते हैं। कम दर तय करने के कारण कंपनी को भारी नुकसान होता है, परन्तु इसकी चिंता प्रबंधन को नहीं है।
सीसीएल की ओर से कोयले की ओपन सेल खोली जाती है। इसमें डीओ धारक स्वेच्छा से बिडिंग करते हैं। इसमें प्रबंधन का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। अगर कहीं कोई शिकायत मिलती है, तो उसमें प्रबंधन प्रशासन से सहयोग लेता है। सेल कमेटी से प्रबंधन का कोई लेना देना नहीं है। एक तरह से सेल कमेटी प्रबंधन व् प्रशासन की मौन स्वीकृति से अघोषित रंगदारी है। डीओ धारक ज्यादा दर पर कोयला बिडिंग करते हैं, तो उन्हें प्रशासनिक सुरक्षा देकर कोयला उठाव में मदद की जाती है।
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