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अक्षरा आर्ट्स पटना द्वारा किलकारी बाल भवन सैदपुर में नाटक तोता का मंचन

एस. पी. सक्सेना/पटना (बिहार)। बिहार की राजधानी पटना के किलकारी बाल भवन सैदपुर में 28 जून को नाटक तोता का मंचन किया गया।

जानकारी देते हुए प्रसिद्ध रंगकर्मी व् कलाकार साझा संघ के सचिव मनीष महीवाल ने कहा कि अक्षरा आर्ट्स पटना के सौजन्य से रवीन्द्रनाथ टैगोर के प्रसिद्ध किस्से तोता पर आधारित विशेष नाट्य तोता की प्रस्तुति, आलेख, परिकल्पना, निर्देशन और किस्सा ख्वानी संतोष राणा और अजीत कुमार द्वारा प्रस्तुत किया गया।

कहा कि किलकारी बाल भवन, सैदपुर तोता (द पैरट स्टोरी)
वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई से किया गया पड़ताल है। नाटक के अनुसार पिंजरा सोने का था, तोता मिट्टी का हो गया। पंख नोचे, आवाज़ छीनी, पन्ने ठूंसे और नाम रखा शिक्षा।

महीवाल के अनुसार अक्षरा आर्ट्स की प्रस्तुति तोता (द पैरेट स्टोरी) किलकारी, बाल भवन, पटना के मंच पर टैगोर की कालजयी कथा को क़िस्सा ख्वानी और फोरम थिएटर के संगम से जीवंत करती है और दर्शकों को बेचैन कर जाती है। मंच पर कोई भारी-भरकम सेट नहीं, कोई चकाचौंध नहीं। बस दो कलाकार संतोष राणा और अजीत कुमार और उनके बीच एक क़िस्सा। लेकिन जब पहला संवाद गूंजा, तब हॉल की हर सीट पर बैठे दर्शक को लगा जैसे यह कहानी उनकी अपनी है। यही तोता द पैरेट स्टोरी की असली ताकत है।

महीवाल ने कहा कि अक्षरा आर्ट्स पटना ने रवीन्द्रनाथ टैगोर की वर्ष 1918 की कालजयी रूपक-कथा तोता को मंच पर उतारा है और वह भी किसी साधारण नाटक के रूप में नहीं, बल्कि दो जीवंत परंपराओं के अद्भुत संगम के रूप में एक तरफ है क़िस्सा ख्वानी। वह पुरानी मौखिक कथा-शैली जिसमें क़िस्सागो स्वयं कहानी बन जाता है और दूसरी तरफ है फोरम थिएटर, जो दर्शक को मात्र देखने वाला नहीं, बल्कि कथा का सह-निर्माता बना देता है।

जब मंच से सवाल उठा कि पढ़ने का मतलब क्या सिर्फ परीक्षा पास करना है? हॉल में सन्नाटा छा गया।
अनुशासन भूमि के राजा की कहानी, उनके भांजे की महत्वाकांक्षा, विद्वानों की बहसें, सोने के पिंजरे का निर्माण, पोथियों के पहाड़ और उन सबके बीच एक निर्दोष तोता जो बस गाता था, नाचता था, जीता था। यह कथा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, दर्शक समझने लगते हैं कि यह तोता कोई और नहीं हमारे घरों में, हमारे स्कूलों में, हमारी व्यवस्था में जीने वाला हर वह बच्चा है जिसकी जिज्ञासा को अनुशासन के नाम पर कुचला जाता है।

नाटक में दोनों कलाकारों ने अपनी भूमिकाओं में असाधारण परिपक्वता दिखाई। संतोष राणा और अजीत कुमार कभी राजा बनते हैं, कभी विद्वान, कभी तोता और यह संक्रमण इतना सहज है कि दर्शक कहीं नहीं अटकता। क़िस्सागो की शैली में कहानी कहते हुए वे बीच-बीच में दर्शकों से सवाल करते हैं, उन्हें मंच पर बुलाते हैं और यही फोरम थिएटर का जादू है। दर्शक अचानक महसूस करता है कि वह भी इस कहानी का एक पात्र है।

मंच-सज्जा की बात करें तो मंच पर केवल एक प्लेटफार्म सफेद चादर से ढका। उसपर मसनद और सामने पानी से भरा दो लोटा। यह सादगी भरा मंच पारंपरिक क़िस्सा ख्वानी का याद दिलाती है। साधना कुमारी का संगीत कहानी की लय को थामे रखता है। अभिषेक का ध्वनि संयोजन और राजकपूर की प्रकाश परिकल्पना मंच को जीवंत बनाती है। बिना किसी चमक-दमक के, बस सटीकता से। मंच पार्श्व की व्यवस्था अजीत कुमार ने देखा था।आयोजन सहयोग किलकारी बिहार बाल भवन पटना और टीचर्स ऑफ बिहार द्वारा किया गया था।

नाटक का शो खत्म होने के बाद भी हॉल खाली नहीं हुआ। दर्शक, अभिभावक, शिक्षक, छात्र कलाकारों के इर्द-गिर्द जमा होकर देर तक बातें करते रहे। कई शिक्षकों ने मांग की कि यह नाटक स्कूल-कॉलेजों में दिखाया जाए। यह प्रतिक्रिया अपने आप में इस नाटक की सबसे बड़ी समीक्षा है। महीवाल के अनुसार तोता केवल टैगोर की कहानी नहीं है। यह हमारी शिक्षा-व्यवस्था का आईना है। हमारे समय का दस्तावेज़ है। अक्षरा आर्ट्स ने साबित किया है कि बड़े बजट और भव्य सेट के बिना भी थिएटर दिल तक पहुँच सकता है, बशर्ते कलाकार के पास ईमानदारी हो और कहानी में दम हो।

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