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सोनपुर की विरासत: जहाँ दलित शिल्पी द्वारा गढ़ी गई दुर्गा प्रतिमा ने तोड़ी जाति की दीवारें

पहाड़ी चक के रघुवंशी राम ने 62 वर्ष पूर्व बिना गुरु के बनाई थी पहली प्रतिमा

बंगाली कॉलोनी से विनोद भवन तक फैली है इस पूजा की ऐतिहासिक यात्रा

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। कभी एशिया महादेश के सबसे बड़े रेलवे प्लेटफॉर्म के लिए विख्यात रहा सारण जिला के हद में सोनपुर अपनी सांस्कृतिक समरसता के लिए भी एक अनोखा इतिहास समेटे है। इस इतिहास का केंद्र है सोनपुर के रेलवे लाइन से सटे दक्षिण स्थित नगर का पहाड़ी चक गांव।

खतियानी दस्तावेजों में जिसका नाम धर्मपुर देयाल उर्फ बिहारी चक दर्ज है, उसी पहाड़ी चक की दुर्गा पूजा आज केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक है। इस पूजा की नींव किसी स्थापित मूर्तिकार ने नहीं, बल्कि पहाड़ीचक के एक मलिन दलित टोले में रहने वाले चर्मकार शिल्पी समुदाय के युवक रघुवंशी राम ने रखी थी।

पहाड़ी चक रहिवासी सेवानिवृत रेलकर्मी अमर तिवारी बताते हैं कि ब्रिटिश शासनकाल में पहाड़ीचक और बभनगांवां के कुछ हिस्से को अधिग्रहित कर पहाड़ी चक रेलवे कॉलोनी बसाई गई थी। चूंकि मार्च 1912 तक बिहार और उड़ीसा बंगाल प्रेसीडेंसी का ही हिस्सा था, इसलिए यहां रेलवे में नौकरी करने वाले बांग्ला भाषियों की संख्या अधिक थी, इसलिए स्थानीय बोली में इसे बंगाली कॉलोनी कहा जाता था।

बताया जाता है कि शुरुआत में बांग्ला भाषी परिवार अपने आवासीय परिसर में ही दुर्गा प्रतिमा स्थापित कर पूजा करते थे। बाद में वर्ष 1938 -39 में रेलवे इंस्टीट्यूट का निर्माण हुआ, जिसे आज हम विनोद भवन के नाम से जानते हैं, तब पूजा वहीं स्थापित होने लगी। दस दिनों की पवित्रता, धूपों से सुगंधित वातावरण, बंगाल से आए पुजारियों के मुख से दुर्गा सप्तशती के मंत्रों की गूंज, मोर-मयूर पंखों से सज्जित पारंपरिक ढाक और मिट्टी की धूपदानियों के धुएं के बीच होने वाली मंगला संध्या आरती स्थानीय रहिवासियों के लिए आकर्षण और कौतुहल का बड़ा केंद्र था।

बिना गुरु के रघुवंशी ने गढ़ दी माता की मूरत और टूटी जाति की दीवार

इसी परिवेश में पल-बढ़ रहा था पहाड़ी चक के दलित टोले का बालक रघुवंशी। बालपन से ही वह बंगाली मूर्तिकारों को मूर्ति बनाते हुए कौतूहल से देखता था। न कोई गुरु, न कोई प्रशिक्षण। केवल अपनी कल्पना से उसने अपने पड़ोसी एक हजाम के दरवाजे पर मिट्टी से एक बड़ी आकर्षक दुर्गा प्रतिमा गढ़ दी।

गांव के नवयुवकों ने कुमार रणवीर सिंह, कृष्णा सिंह, बभन टोली, धनंजय सिंह (अब) स्व. सुशील कुमार सिंह, स्व.कामेश्वर सिंह, स्व. जयनाथ सिंह के नेतृत्व में उल्लास में उसके इस साहस को हाथों-हाथ लिया। प्रतिमा के आभूषण, साज-श्रृंगार का प्रबंध किया। वर्ष 1913 से यहां सक्रिय नाट्य समिति की टोली ने चंदा इकट्ठा कर नवयुवक दुर्गा पूजा समिति पहाड़ी चक का गठन किया और यहीं जाति की सारी वर्जनाएं समाप्त हो गईं।

वर्तमान में समिति के महासचिव कुंदन सिंह उर्फ विकू के नेतृत्व में पूजा का आयोजन हो रहा है। गांव के ही प्रबुद्ध ब्राह्मण विद्वान पंडित बलराम दीक्षित ने आगे आकर विधानपूर्वक प्रतिमा की स्थापना और पूजा करवाई। समय ने करवट ली और रेलवे की वह भव्य व्यवस्था सिमट गई। आज विनोद भवन की वह प्रसिद्ध दुर्गा पूजा भी इतिहास बन गई है, पर बंगाली कलाकारों से प्रेरित दलित समुदाय के युवक रघुवंशी राम की मूर्ति से आरम्भ हुई पहाड़ी चक की दुर्गा पूजा आज भी जीवंत है। यह इस बात का प्रमाण है कि सत्ता और संसाधन से स्थापित परंपराएं समय के साथ विलीन हो सकती हैं, पर जन-भावना, कला और समरसता की नींव पर टिकी परंपरा अमर हो जाती है।

आज भी पहाड़ी चक में स्थापित होने वाली दुर्गा प्रतिमा को देखने दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। लगभग दो दशक पूर्व इसे उत्कृष्ट पंडाल और प्रतिमा का पुरस्कार भी मिला था। हर वर्ष नवयुवकों की नई टोली उसी श्रद्धा और लगन से उस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। वहीं, बाबा हरिहरनाथ मंदिर, पहलेजा धाम निचली सड़क पर हनुमान मंदिर ब्रह्म स्थान पर नवयुवक युवक दुर्गा पूजा समिति पहाड़ी चक में भी पूजा आयोजित है। इसी सड़क किनारे राहर दियारा चौक पर स्थापित दुखहरणी दुर्गा मंदिर परिसर में भी पूजा हो रही है।

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