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मॉब लिंचिंग, आरक्षण, जनजातीय विश्वविद्यालय विधेयक कब तक लंबित रहेंगे-नायक

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। मॉब लिंचिंग, आरक्षण(संशोधन) विधेयक, जनजातीय विश्वविद्यालय जैसे जनहित के विधेयक कब तक लंबित रहेंगे? झारखंड के राज्यपाल राज्य की जनता को इसका जवाब दें। उक्त बाते झारखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने 24 अगस्त को कही।

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने लोक भवन में झारखंड विधानसभा से पारित जनहित के विधेयकों की लंबित स्थिति पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यह अब केवल विधायी प्रक्रिया का सवाल नहीं, बल्कि झारखंड की जनता के अधिकार, सुरक्षा, सामाजिक न्याय और भविष्य का सवाल बन चुका है। उन्होंने कहा कि विधानसभा में जनप्रतिनिधियों ने बहस की, मतदान किया और जनता के हित में विधेयक पारित किए। यदि वही विधेयक वर्षों तक लोक भवन में निर्णय की प्रतीक्षा करते रहें, तो जनता पूछेगी कि उसके हित में बनाए गए कानून आखिर जमीन पर कब उतरेंगे?

नायक ने कहा कि उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में अप्रैल 2025 में झारखंड विधानसभा सचिवालय के हवाले से 13 विधेयकों के राजभवन में लंबित होने की बात सामने आई थी। अब अगस्त 2026 में कांग्रेस की स्पष्ट मांग है कि इन सभी विधेयकों की वर्तमान स्थिति राजभवन और विधानसभा सचिवालय सार्वजनिक करे। मॉब लिंचिंग बिल: जनता की सुरक्षा कब? उन्होंने कहा कि झारखंड प्रिवेंशन ऑफ मॉब वायलेंस एंड मॉब लिंचिंग बिल, 2021 जैसे विधेयक का सीधा संबंध नागरिकों की सुरक्षा और कानून के शासन से है।

कहा कि जब विधानसभा ने मॉब हिंसा और मॉब लिंचिंग जैसी गंभीर घटनाओं से निपटने के लिए विशेष कानूनी व्यवस्था का रास्ता बनाया, तो जनता जानना चाहती है कि उस कानून का क्या हुआ? वह कब लागू होगा? उसकी संवैधानिक स्थिति क्या है? भीड़ की हिंसा का शिकार होने वाला किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं, बल्कि सबसे पहले एक नागरिक होता है। इसलिए नागरिक सुरक्षा से जुड़े कानून पर अनिश्चितता को सामान्य प्रशासनिक देरी मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।

नायक ने कहा कि झारखंड आरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2022 सामाजिक न्याय और युवाओं के शिक्षा एवं रोजगार के अवसरों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। उन्होंने कहा कि आरक्षण पर विधानसभा में बहस हो सकती है, राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, संवैधानिक परीक्षण हो सकता है, लेकिन युवाओं को अनिश्चितता में नहीं रखा जा सकता। उन्हें स्पष्ट जवाब चाहिए कि उनके भविष्य से जुड़े विधेयक की संवैधानिक यात्रा किस चरण में है।

उन्होंने कहा कि एक-एक साल की देरी किसी नेता के लिए केवल राजनीतिक तारीख हो सकती है, लेकिन नौकरी की उम्र पार कर रहे युवा के लिए वही देरी उसके जीवन का अवसर छीन सकती है। नायक ने कहा कि पंडित रघुनाथ मुर्मू जनजातीय विश्वविद्यालय से संबंधित विधायी पहल झारखंड के आदिवासी समाज में उच्च शिक्षा, भाषा, संस्कृति और ज्ञान परंपरा को संस्थागत आधार देने की दिशा में महत्वपूर्ण थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय संबंधी विधायी स्थिति में बाद में परिवर्तन हुए हैं। इसलिए पुराने विधेयक को वर्तमान में लंबित बताने के बजाय लोक भवन और विधानसभा को उसकी अद्यतन स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की शिक्षा और भविष्य से जुड़े हर विधायी प्रयास की स्थिति सार्वजनिक होनी चाहिए। कहा कि झारखंड की जनता को फाइलों के पीछे छिपी संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, साफ-साफ जवाब चाहिए। नायक ने कहा कि झारखंड विद्युत शुल्क (संशोधन) विधेयक, झारखंड न्यायालय शुल्क (संशोधन) विधेयक और झारखंड क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण (संशोधन) विधेयक जैसे विषय सीधे आमजन के जीवन, बिजली व्यवस्था, न्याय तक पहुंच, शहरी नियोजन और विकास से जुड़े हैं। कहा कि बिजली का बिल भरने वाला आम इंसान हो, न्याय के लिए अदालत जाने वाला गरीब हो या अपने घर-जमीन के लिए विकास प्राधिकरण की प्रक्रिया से गुजरने वाला नागरिक, हर किसी को यह जानने का अधिकार है कि उसके हित से जुड़ा कानून किस स्थिति में है।

कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता नायक ने कहा कि वर्ष 2025 में विधानसभा से पारित कोचिंग सेंटर नियमन, व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों की फीस, एमएसएमई, गिग श्रमिकों, जेल एवं सुधार सेवाओं तथा फैक्ट्री कानून से संबंधित विधेयकों की भी वर्तमान स्थिति जनता के सामने रखी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कौन-सा विधेयक स्वीकृत हुआ, कौन वापस आया, किस पर पुनर्विचार हुआ, कौन राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजा गया और कौन लंबित है। राजभवन को यह पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस राज्यपाल के संवैधानिक पद की गरिमा का पूरा सम्मान करती है, लेकिन संवैधानिक गरिमा का अर्थ यह नहीं हो सकता कि जनता अपने सवाल पूछना छोड़ दे। उन्होंने कहा कि हम राज्यपाल पर व्यक्तिगत आरोप नहीं लगा रहे हैं।

हमारा सवाल संवैधानिक प्रक्रिया से है। अगर किसी विधेयक पर आपत्ति है तो बताइए, पुनर्विचार चाहिए तो भेजिए, राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजना है तो भेजिए, लेकिन जनता को अनिश्चितकालीन इंतजार में क्यों रखा जाए? उन्होंने मांग की कि राजभवन और विधानसभा सचिवालय सभी लंबित विधेयकों की अद्यतन बिल स्टेटस लिस्ट तत्काल सार्वजनिक करें।

नायक ने कहा कि झारखंड विधानसभा में जनता की आवाज उठी, मतदान हुआ और विधेयक पारित हुआ। अब वह आवाज लोक भवन की फाइल में अनिश्चितकाल तक खामोश नहीं रह सकती। जनता को संख्या नहीं, निर्णय चाहिए। फाइल नहीं, कानून चाहिए। इंतजार नहीं, अपने अधिकार का लाभ चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे को संवैधानिक मर्यादा के भीतर रहते हुए जनता के अधिकार और लोकतांत्रिक जवाबदेही का बड़ा सवाल बनाएगी।

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