एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा अलग-अलग योजनाओं के तहत चुनिंदा सरकारी विद्यालयों को मॉडल विद्यालय के रूप में विकसित किया जा रहा है। गंभीर सवाल उठना लाजिमी है कि जब दोनों योजनाओं का मूल उद्देश्य सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर आधारभूत संरचना, आधुनिक शिक्षण व्यवस्था और विद्यार्थियों के सीखने के परिणामों में सुधार करना है, तो इसके लिए दो अलग-अलग मॉडल बनाना कितना आवश्यक है? क्या यह शैक्षणिक संस्थानों का राजनितिकरण नहीं है। उक्त बाते ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन (एआईएसएफ) रांची जिलाध्यक्ष एहतेशाम परवीन ने 29 अगस्त को कही।
उन्होंने कहा कि यूडीआईएसई-2024-25 के आंकड़ों के अनुसार झारखंड में 35,788 सरकारी प्रबंधन वाले विद्यालय हैं। वहीं 2025-26 के केंद्रीय आंकड़ों के अनुसार राज्य में 413 पीएमश्री विद्यालय हैं। दूसरी ओर, राज्य सरकार के आदर्श विद्यालय योजना के तहत फिलहाल 80 विद्यालय संचालित हैं। कहा कि बीते 25 अगस्त को राज्य मंत्रिमंडल ने 100 और मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालय विकसित करने के लिए 721.43 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है।
एआईएसएफ जिलाध्यक्ष एहतेशाम ने कहा कि पीएमश्री योजना केंद्र सरकार की योजना है, जिसके तहत मौजूदा सरकारी विद्यालयों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप आदर्श एवं अनुकरणीय विद्यालयों के रूप में विकसित करने पर जोर दिया जाता है। वहीं मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालय योजना के माध्यम से भी सरकारी विद्यालयों में आधुनिक आधारभूत संरचना, बेहतर शिक्षण व्यवस्था और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि राज्य में कितने पीएमश्री या मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालय बनाए जा रहे हैं। असल सवाल यह है कि झारखंड के बाकी 35,295 सरकारी विद्यालयों की स्थिति कब और कैसे सुधरेगी?
उन्होंने कहा कि सरकार को पीएमश्री और मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालय के बीच संभावित दोहराव और अनावश्यक समानांतर व्यवस्था को समाप्त करते हुए एकीकृत शिक्षा नीति, पारदर्शी बजट और स्पष्ट शैक्षणिक परिणामों के आधार पर काम करना चाहिए। कहा कि सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि इन योजनाओं के तहत आधारभूत संरचना के साथ-साथ शिक्षकों की नियुक्ति, शिक्षक प्रशिक्षण, शैक्षणिक गुणवत्ता और विद्यार्थियों के सीखने के परिणामों पर कितना खर्च किया जा रहा है। केवल भवन और आधुनिक सुविधाएं तैयार करने से सरकारी शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी। जब तक पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित शिक्षक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सुनिश्चित नहीं किया जाता।
एहतेशाम ने कहा कि हमारी मांग है कि कुछ चुनिंदा विद्यालयों को उत्कृष्ट बनाने के साथ-साथ झारखंड के सभी सरकारी विद्यालयों में शिक्षक, भवन, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, डिजिटल सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण का न्यूनतम समान मानक लागू किया जाए। कहा कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता किसी चुनिंदा विद्यालय का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर बच्चे का अधिकार है। न कि शिक्षण संस्थान राजनितिकरण का केंद्रविन्दु।
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