अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण एवं निकटवर्ती वैशाली जिले में शारदीय नवरात्र एवं दुर्गा पूजा की तैयारी जोर शोर से की जा रही है।
ज्ञात हो कि शास्त्र गणना के अनुसार इस वर्ष शारदीय नवरात्र का शुभारंभ आगामी 11 अक्टूबर को प्रतिपदा तिथि में कलश स्थापना के साथ होगा। चित्रा नक्षत्र एवं वैधृति योग में हाथी पर मां दुर्गा आयेंगी और चरणायुध पर उनकी विदाई होगी।
वाराणसी पंचाङ्ग के अनुसार प्रतिपदा 10 अक्टूबर रात्रि 8:32 से शुरू होकर 11 अक्टूबर रात्रि 10:49 तक रहेगी, परन्तु उदया तिथि के कारण घटस्थापना 11 अक्टूबर को ही मान्य है। सुबह 6:13 से 10:12 तक घटस्थापना का उत्तम मुहूर्त है। वैसे दिन भर सुविधानुसार भी कलश स्थापना होगी। जो अभिजित मुहूर्त में करना चाहें, वे दोपहर 11:36 से 12:24 तक में करें।
दिशा के संस्थापक सचिव आचार्य राजेश कुमार तिवारी के अनुसार इस बार माता का आगमन रविवार के कारण गज (हाथी) पर होगा। देवी भागवत में कहा गया है कि शशि सूर्ये गजारूढ़ा। हाथी को शक्ति, स्थिरता, धैर्य और समृद्धि का प्रतीक माना गया है, इसलिए इसका आगमन देश में अच्छी वर्षा, कृषि समृद्धि और सुख-शांति का संकेत देता है।
वहीं 20 अक्टूबर मंगलवार को विजयादशमी के दिन माता का गमन होगा। मंगलवार को विजया होने से प्रस्थान वाहन चरणायुध अर्थात मुर्गा माना गया है। शास्त्र में इसे कुक्कुट वाहन भी कहते हैं। इस वाहन को लोक मान्यता में उथल-पुथल और सतर्कता का संकेत माना जाता है। अतः विदाई के बाद संयम और शांति पाठ की सलाह दी जाती है। आचार्य तिवारी ने बताया कि इस वर्ष महा अष्टमी 18 अक्टूबर रविवार को पड़ रही है। नवमी एवं पूर्णाहुति 19 अक्टूबर सोमवार को और विजयादशमी श्रवणा नक्षत्र के साथ 20 अक्टूबर मंगलवार को मनाई जाएगी।
मां के इन नौ स्वरूपों की होगी पूजा
आचार्य राजेश तिवारी बताते हैं कि शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। नवरात्र के अवसर पर सारण जिला के हद में सोनपुर के काली घाट पर कोलकाता के बाद देश की दूसरी एवं बिहार की पहली दक्षिणेश्वरी काली मंदिर में दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ लगी रहती है। कहा कि माँ के विविध स्वरूप की पूजा होगी, जिनमें प्रथम दिन शैलपुत्री: पर्वतराज हिमालय की पुत्री। वृषभ पर सवार। स्थिरता और मन की दृढ़ता प्रदान करती हैं। द्वितीय ब्रह्मचारिणी: कठोर तपस्या का प्रतीक। ज्ञान, वैराग्य और संयम की अधिष्ठात्री हैं। तृतीय चंद्रघंटा: मस्तक पर अर्धचंद्र से सुशोभित। इनकी आराधना से भय का नाश और शत्रु बाधा दूर होती है। चतुर्थ कूष्मांडा: अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने वाली। आयु, यश और आरोग्य देने वाली हैं।
पंचम स्कंदमाता: भगवान कार्तिकेय की माता। संतान सुख और वात्सल्य की प्रदायिनी हैं। षष्ठम कात्यायनी: महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में अवतरित। दांपत्य जीवन में सुख और शत्रुओं पर विजय दिलाती हैं। सप्तम देवी दुर्गा कालरात्रि की पूजा नयागांव के डुमरी बुजुर्ग गांव में होती है जो अंधकार का नाश करने वाली हैं। भक्तों को अभय प्रदान कर ग्रह बाधा को दूर करती हैं।अष्टम महागौरी: गौर वर्ण, श्वेत वस्त्र धारिणी। पापों का क्षय कर शुद्धता और समृद्धि देती हैं। नवम सिद्धिदात्री: सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। इनकी कृपा से साधक को मोक्ष और ज्ञान की प्राप्ति होती है।
पंडित उमेश तिवारी का कहना है कि नवरात्र में अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व है। शास्त्रों में 2 से 10 वर्ष तक की कन्या को देवी का साक्षात स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि कन्या पूजन के बिना नवरात्र का अनुष्ठान अधूरा रहता है। इसी बहाने हम नारी शक्ति के सम्मान का संकल्प भी लेते हैं। नौ कन्याओं को नवदुर्गा का प्रतीक मानकर पूजन किया जाता है, जबकि एक बालक (भैरव) को भी साथ में भोजन कराया जाता है। कन्याओं के चरण धोकर, तिलक लगाकर, चुनरी ओढ़ाकर और हलवा-पूरी, चने का प्रसाद खिलाकर दक्षिणा देने से मां भगवती शीघ्र प्रसन्न होती हैं। इससे घर में सुख-शांति, धन-धान्य की वृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
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