प्रहरी संवाददाता/रांची (झारखंड)। गरीबों का शोषण करने वाले दबंगो तथा जमींदारों के खिलाफ हंसुआ उठाने वाली मां रूपी सोरेन के संघर्ष, संस्मरण और एक खामोश जीवन को भावभीनी श्रद्धांजलि। उक्त बाते झारखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने बीते 7अक्टूबर की रात्रि लगभग 8:30 बजे झारखंड के मुख्यमंत्री (सीएम) हेमंत सोरेन की माता के निधन को लेकर 8 अक्टूबर को कही।
प्रदेश प्रवक्ता नायक ने कहा कि झारखंड का इतिहास केवल आंदोलनों, नारों, चुनावों और सत्ता के उतार-चढ़ाव से नहीं बनता। इतिहास के कुछ सबसे मार्मिक अध्याय उन जीवनों में लिखे जाते हैं, जो मंच की रोशनी से दूर रहते हैं, लेकिन संघर्ष की कठिन तपिश को बहुत करीब से महसूस करते हैं। रूपी सोरेन का जीवन ऐसा ही एक अध्याय था। कहा कि उनकी कहानी को समझने के लिए भावनाओं के साथ-साथ समय का क्रम भी समझना जरूरी है। इसलिए उनके जीवन के प्रमाणित तथ्यों और उनसे जुड़े संस्मरणों को अलग-अलग रखते हुए उनकी जीवन-यात्रा को कालक्रम में देखना अधिक उचित होगा।
कहा कि रूपी सोरेन का जीवन-यात्रा वर्ष 1962 में उनके विवाह और संघर्षपूर्ण जीवन की शुरुआत से होता है। उनका विवाह 1 जनवरी 1962 को दिशोम गुरु शिबू सोरेन से हुआ। विवाह के बाद उनका जीवन ऐसे परिवार से जुड़ा, जिसका आगे चलकर झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान बना। यह वह समय था जब अलग झारखंड राज्य अस्तित्व में नहीं था और शिबू सोरेन का सार्वजनिक संघर्ष अपने शुरुआती दौर में था।
नायक ने कहा कि रूपी सोरेन की अपनी सार्वजनिक तथा राजनीतिक भूमिका उस समय प्रमुख नहीं थी। उनका जीवन मुख्यतः परिवार और घरेलू जिम्मेदारियों से जुड़ा था। 60 और 70 के दशक में रूपी सोरेन के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंग बाद में उनके स्वयं के संस्मरणों और परिवार से जुड़े सदस्यों के बयानों के माध्यम से सामने आए।
कहा कि वर्ष 2023 के अपने विशेष साक्षात्कार में उन्होंने आर्थिक कठिनाइयों, महाजनों के दबाव और शिबू सोरेन के लंबे समय तक घर से दूर रहने के प्रसंग याद किए थे। महाजन और हंसुआ का संस्मरण से जुड़े संस्मरणों में बिष्टु साव नामक महाजन से खेत को लेकर हुए टकराव का प्रसंग विशेष रूप से चर्चित है। बताया गया कि जब खेत पर कब्जे की कोशिश हुई तो रूपी सोरेन ने विरोध किया और हंसुआ उठा लिया।
यह प्रसंग उनकी अपनी स्मृति/परिवार के संस्मरण के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि स्वतंत्र रूप से प्रमाणित सरकारी रिकॉर्ड की घटना के रूप में। इस संस्मरण का भाव स्पष्ट है कि एक ग्रामीण महिला अपने परिवार की जमीन और घर की रक्षा के लिए परिस्थिति के सामने खड़ी थी। यहीं से हंसुआ उठाने वाली मां का प्रतीकात्मक अर्थ सामने आता है।
70 के दशक में पुलिस की पूछताछ और घर की चौखट रूपी सोरेन से जुड़े संस्मरणों में यह भी आता है कि शिबू सोरेन के संघर्षपूर्ण दौर में पुलिस घर पर पूछताछ के लिए आती थी। इसी संदर्भ में उनका एक कथित कथन बाद की रिपोर्टों में उद्धृत हुआ कि यह शिबू सोरेन का घर नहीं है, रूपी सोरेन का घर है। इस कथन को भी रिपोर्टेड संस्मरण के रूप में ही प्रस्तुत करना अधिक उचित है। लेकिन उस एक वाक्य में उनकी मानसिक दृढ़ता की तस्वीर दिखाई देती है। वह किसी राजनीतिक मंच पर नहीं थीं। वह अपने घर की चौखट पर थीं। वहीं उन्होंने अपने हिस्से का साहस दिखाया।
दिवंगत रूपी सोरेन के संस्मरणों में यह भी सामने आया कि शिबू सोरेन लंबे समय तक घर से बाहर रहते थे और परिवार को उनकी सही जानकारी नहीं मिल पाती थी। एक प्रसंग के अनुसार रूपी सोरेन अपनी सास और ननद के साथ, छोटे बेटे को लेकर, उन्हें तलाशने जंगलों तक गई थी। जब शिबू सोरेन का सार्वजनिक जीवन संघर्षों से घिरा रहा, तब परिवार की जिम्मेदारियां रूपी सोरेन के हिस्से में रही। उनकी पहचान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही था कि उन्होंने परिवार को संभाला और बच्चों का पालन-पोषण किया। यहां भावनात्मक सम्मान और तथ्य के बीच संतुलन जरूरी है।
नायक के अनुसार यह कहना उचित है कि वह परिवार की महत्वपूर्ण आधार थीं; लेकिन उनके बच्चों की प्रत्येक उपलब्धि का श्रेय केवल उन्हें देना तथ्य-सम्मत नहीं होगा। मां की भूमिका का सम्मान करने के लिए अतिशयोक्ति की आवश्यकता नहीं होती। नायक ने कहा कि दिवंगत रूपी सोरेन के जीवन का सबसे स्पष्ट रूप से प्रमाणित राजनीतिक अध्याय वर्ष 1999 का लोकसभा चुनाव है।
दुमका लोकसभा क्षेत्र से उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार बाबूलाल मरांडी 2,01,141 वोट, रूपी सोरेन किस्कू 1,96,493 वोट, अंतर 4,648 वोट। वे इस चुनाव में दूसरे स्थान पर रहीं। यह तथ्य उनके जीवन को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि रूपी सोरेन केवल राजनीतिक परिवार की सदस्य भर नहीं थी। उन्होंने स्वयं भी चुनावी राजनीति में प्रवेश किया था और एक बेहद करीबी लोकसभा मुकाबला लड़ा था। इसके बाद वह लगातार चुनावी राजनीति में सक्रिय नहीं रहीं।
नायक ने कहा कि 15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना। रूपी सोरेन उस ऐतिहासिक परिवर्तन को एक ऐसे परिवार की सदस्य के रूप में देख रही थीं, जिसका जीवन झारखंड के राजनीतिक संघर्ष से गहराई से जुड़ा था। उन्हें आंदोलन की औपचारिक नेता कहना उपलब्ध प्रमाणों से आगे जाना होगा। कहा कि अधिक तथ्य-सम्मत बात यह है कि वह उस संघर्षशील परिवार की सदस्य और उस दौर की निकट साक्षी थीं। वर्ष 2009 में उनके बड़े पुत्र दुर्गा सोरेन का निधन उनके जीवन का एक अत्यंत निजी और गहरा आघात था।
राजनीतिक इतिहास इस घटना को एक तारीख के रूप में दर्ज कर सकता है, लेकिन एक मां के लिए संतान को खोने का दुःख किसी तारीख में सीमित नहीं होता। रूपी सोरेन के जीवन में यह वह पीड़ा थी, जिसे सार्वजनिक राजनीति के आंकड़ों से समझा ही नहीं जा सकता। नायक ने कहा कि मई दिवस एक मई 2023 को दिए गए विशेष साक्षात्कार में रूपी सोरेन ने अपने जीवन के कई पुराने प्रसंग स्वयं याद किए। महाजनों का दबाव, परिवार की कठिनाइयां, शिबू सोरेन का लंबे समय तक घर से बाहर रहना और उन्हें तलाशने की चिंता जैसे प्रसंग इसी माध्यम से व्यापक रूप से सामने आए। इसलिए उनके जीवन की कहानी लिखते समय 2023 का उनका साक्षात्कार एक महत्वपूर्ण संस्मरण-स्रोत है। इस दौरान 4 अगस्त 2025 को शिबू सोरेन का निधन, छह दशक से अधिक की जीवन-यात्रा में साथ रहे जीवनसाथी की विदाई रूपी सोरेन के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तिगत पड़ाव था।
इस घटना के बाद वह परिवार की वरिष्ठतम पीढ़ी की महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में रह गई। इस क्रम में इस वर्ष बीते 23 जून को राष्ट्रपति भवन में शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण प्रदान किया गया। उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से यह सम्मान ग्रहण किया। वह व्हीलचेयर पर समारोह में उपस्थित थी। यह दृश्य अपने भीतर एक गहरी जीवन-कथा समेटे था। जिसके साथ उन्होंने छह दशक से अधिक जीवन बिताया, उसके जाने के बाद उसी के सम्मान को उन्होंने स्वयं ग्रहण किया। कुछ ही महीनों बाद बीते 7 अक्टूबर को उनकी अपनी जीवन-यात्रा भी समाप्त हो गई।
नायक ने कहा कि उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार बीते माह 18 सितंबर को सांस लेने में परेशानी के बाद रूपी सोरेन को रांची के हिल व्यू अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनकी तबीयत गंभीर बनी रही और उनका उपचार जारी रहा। बीते 7 अक्टूबर को रांची के हिल व्यू अस्पताल में रूपी सोरेन का निधन हुआ। उपलब्ध अस्पताल संबंधी रिपोर्ट में उनके निधन का समय लगभग रात 8:30 बजे बताया गया है। उनके निधन के साथ एक परिवार ने अपनी मां खोई और झारखंड ने उस पीढ़ी की एक ऐसी महिला को खो दिया, जिसकी जीवन-कथा राजनीति के मंच से अधिक परिवार, संघर्ष और स्मृतियों में दर्ज थी।
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