एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। राज्यपाल का पद संविधान का है, यह भाजपा का प्रचार मंच नहीं है। ओडिशा के राज्यपाल ब्रज मोहन राम के कथित बयान से संवैधानिक मर्यादा पर गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है। राजभवन में संविधान चलेगा या भाजपा का एजेंडा? भाजपा के एससी मोर्चे को मजबूत करने और दलितों से भाजपा के पक्ष में वोट दिलाने की बात कहना लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है।
उक्त बातें झारखंड की राजधानी रांची में 16 अक्टूबर को प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने कही।
नायक ने ओडिशा के नवनियुक्त राज्यपाल ब्रज मोहन राम के कथित उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें उन्होंने ओडिशा जाकर भाजपा के अनुसूचित जाति (एससी) मोर्चा को मजबूत करने तथा दलित समुदाय से भाजपा के पक्ष में वोट दिलाने की चिंता करने की बात कही है।
उन्होंने कहा कि यदि राज्यपाल द्वारा वास्तव में इस प्रकार का बयान दिया गया है, तो यह केवल राजनीतिक बयान नहीं बल्कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद की निष्पक्षता और मर्यादा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। कहा कि राज्यपाल किसी राजनीतिक दल के प्रतिनिधि नहीं होते। वे संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं। इसलिए राज्यपाल पद की शपथ लेने के बाद किसी राजनीतिक दल के संगठन को मजबूत करने अथवा उसके पक्ष में मतदाताओं को लामबंद करने की भूमिका की बात करना गंभीर चिंता का विषय है।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता नायक ने कहा कि भाजपा के प्रति अपनी निष्ठा या संगठन में किए गए अपने पुराने कार्यों का उल्लेख एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में किया जा सकता है, लेकिन राज्यपाल बनने के बाद संवैधानिक दायित्व सर्वोपरि होता है। कहा कि राज्यपाल का पद किसी दल विशेष के लिए राजनीतिक गतिविधियां संचालित करने का पद नहीं है।
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि देश का संविधान राज्यपाल को एक निष्पक्ष संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित करता है। ऐसे में यदि कोई राज्यपाल सार्वजनिक रूप से किसी दल के पक्ष में वोट जुटाने, उसके संगठन को मजबूत करने या किसी विशेष सामाजिक समुदाय को उस दल के पक्ष में मतदान कराने की बात करता है, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे।
नायक ने कहा कि दलित समाज किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं है। अनुसूचित जाति और वंचित समाज अपने संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक विवेक के आधार पर मतदान करते हैं। किसी संवैधानिक पद पर बैठे गणमान्य द्वारा किसी दल के पक्ष में दलित मतदाताओं को प्रभावित करने की बात करना सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की भावना के भी विपरीत है। उन्होंने कहा कि भाजपा को यदि राजनीतिक संगठन मजबूत करना है तो वह अपने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से करे। राज्यपाल के संवैधानिक पद की प्रतिष्ठा को राजनीतिक संगठन के विस्तार के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
कांग्रेस प्रवक्ता नायक ने राष्ट्रपति से भी मांग की कि ओडिशा के नवनियुक्त राज्यपाल के कथित बयान का संज्ञान लिया जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि संवैधानिक पदों पर बैठे गणमान्य जनों के लिए दलीय निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा के क्या मानदंड हैं। उन्होंने कहा कि राज्यपाल का पद संविधान का पद है, भाजपा का संगठनात्मक पद नहीं। इस पद की गरिमा और निष्पक्षता से किसी भी प्रकार का समझौता देश के लोकतांत्रिक संस्थानों में जनता के विश्वास के लिए उचित नहीं होगा।
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