एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम (एससी/एसटी एक्ट) कागज पर मजबूत। भाजपा शासित राज्यों में दलित-आदिवासी न्याय के लिए मजबूर। सबका साथ के नारों के बीच अब एससी/एसटी समाज पूछ रहा, न्याय कब मिलेगा? उक्त बाते 16 सितंबर को झारखंड प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने कही।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने केंद्र की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि देश में एससी/एसटी एक्ट मौजूद है, संविधान मौजूद है, कानून मौजूद है, लेकिन जब दलित और आदिवासी समाज के सम्मान, सुरक्षा और न्याय का सवाल आता है तो केंद्र सरकार की राजनीतिक जवाबदेही कहां दिखाई देती है? उन्होंने कहा कि हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष एवं वरिष्ठ दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद कथित शुद्धिकरण का मामला कोई सामान्य राजनीतिक विवाद नहीं है। कहा कि पुलिस ने बीते 8 सितंबर को एससी/एसटी एक्ट सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज की है। सवाल यह है कि घटना के बाद इतने समय तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई और अब तक जांच कहां पहुंची?
नायक ने कहा कि अगर एक दलित राष्ट्रीय नेता की सभा के बाद सार्वजनिक स्थल को शुद्ध करने की मानसिकता पर सरकारें चुप रहेंगी, तो यह केवल खड़गे का अपमान नहीं है। यह करोड़ों अनुसूचित जाति के सम्मान और बराबरी के संवैधानिक अधिकार पर सवाल है। उन्होंने कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जब इस मुद्दे को उठाया, तब केंद्र और भाजपा को पहले यह बताना चाहिए कि कथित घटना पर निष्पक्ष और समयबद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई। सवाल पूछने वालों को घेरने के बजाय सरकार को अपनी जवाबदेही तय करनी चाहिए। कहा कि जिन पर सार्वजनिक रूप से जातिगत भेदभावपूर्ण आचरण के आरोप लगे हैं, जांच कर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
प्रदेश प्रवक्ता नायक ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट केवल संसद में कानून बनाने और राजपत्र में प्रकाशित करने के लिए नहीं है। उसकी असली परीक्षा तब होती है जब दलित और आदिवासी के साथ कथित भेदभाव, अपमान या अत्याचार की शिकायत सामने आती है। उन्होंने कहा कि बीजापुर के एकलव्य विद्यालय से सामने आए छात्राओं से कथित दुर्व्यवहार के मामले और बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों से जुड़े सवालों ने भी आदिवासी बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और संस्थागत जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। कहा कि केंद्र की मोदी सरकार आदिवासी गौरव की बातें बहुत करती है, लेकिन आदिवासी बच्चियों की सुरक्षा और आदिवासी बच्चों की जान के सवाल पर जवाबदेही भी दिखानी होगी। भाषण और विज्ञापन से आदिवासी समाज को न्याय नहीं मिलता। जमीन पर व्यवस्था बदलनी पड़ती है।
नायक ने स्वतंत्र भारद्वाज मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि दिल्ली की अदालत ने बीते 15 सितंबर को उन्हें तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दी है, जबकि उसपर एक दलित समाज पर हमला एवं पोक्सो एक्ट लगा था। उसके बाद भी इतनी जल्दी जमानत होना समझ से परे है। उन्होंने कहा कि कानून का राज तभी मजबूत होगा जब सत्ता, संगठन, विचारधारा या राजनीतिक पहचान से ऊपर उठकर हर आरोपी और हर पीड़ित के मामले में समान कानूनी प्रक्रिया लागू हो। एससी/एसटी एक्ट का इस्तेमाल हो या उसके तहत कार्रवाई की मांग। दोनों ही स्थितियों में निष्पक्ष जांच और पीड़ित की सुरक्षा सर्वोच्च होनी चाहिए।
केंद्र सरकार से नायक ने सीधे सवाल किया तथा कहा कि हल्द्वानी मामले में जांच की समयबद्ध प्रगति सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही है? कथित शुद्धिकरण में शामिल आरोपियों की पहचान और जवाबदेही कब तय होगी? एससी/एसटी एक्ट के तहत मामलों में पीड़ितों को त्वरित न्याय सुनिश्चित करने की राष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था कहां है? एकलव्य विद्यालयों में आदिवासी छात्राओं की सुरक्षा के लिए केंद्र की जवाबदेही क्या है? आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों की मौतों का स्वतंत्र और सार्वजनिक डेथ ऑडिट कब होगा? केंद्र बताए कि एससी/एसटी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए केवल योजनाओं की घोषणा के बजाय जवाबदेही का ठोस तंत्र क्या है?
नायक ने कहा कि दलित के सम्मान पर चोट होगी तो कांग्रेस आवाज उठाएगी। आदिवासी बेटी की सुरक्षा खतरे में होगी तो कांग्रेस सवाल पूछेगी। आदिवासी बच्चे की मौत होगी तो कांग्रेस हिसाब मांगेगी और संविधान के नाम पर राजनीति करने वाली भाजपा सरकार को अब संविधान के प्रति अपनी जवाबदेही भी साबित करनी होगी। बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर का संविधान किसी सरकार की कृपा नहीं है। एससी और एसटी देशवासियों का सम्मान, समानता और सुरक्षा उनका संवैधानिक अधिकार है। केंद्र सरकार को बताना होगा कि राजपत्र में एससी/एसटी एक्ट जिंदा है, तो जमीन पर उसका असर कहां है?
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