एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने 12 जून को कहा कि देश की जनता को इतिहास नहीं, भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए।
उन्होंने कहा कि सत्ता का मूल्यांकन नारों, विज्ञापनों और इवेंट मैनेजमेंट से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में आए बदलावों से होता है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में भाजपा ने देश की जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे। भ्रष्टाचार मुक्त भारत, हर साल दो करोड़ रोजगार, किसानों की आय दोगुनी, महंगाई पर नियंत्रण, काला धन वापस लाकर हर खाते में 15 लाख रुपये जमा करने, अच्छे दिन और विकास का नया मॉडल। इन वादों के सहारे भाजपा सत्ता में आई थी। आज 12 वर्ष बाद देश की जनता पूछ रही है कि उन वादों का क्या हुआ?
नायक ने कहा कि भाजपा सरकार का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अपने 12 वर्षों का हिसाब देने के बजाय इतिहास बदलने और राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने में अधिक व्यस्त दिखाई देती है। प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और कांग्रेस की विरासत पर हमला भाजपा की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है, क्योंकि वर्तमान की विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए अतीत पर हमला करना सबसे आसान रास्ता है।
लेकिन इतिहास प्रचार से नहीं बदलता। पंडित नेहरू स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे। उन्हीं के नेतृत्व में लोकतांत्रिक संस्थाओं, सार्वजनिक क्षेत्र, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों, आइआईटी, एआइआईएमएस, बड़े बांधों और आधुनिक भारत की बुनियाद रखी गई। सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ भीमराव आंबेडकर और डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक नेहरू मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे। आज भाजपा इन महापुरुषों की विरासत का राजनीतिक उपयोग करती है, लेकिन उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक आदर्शों को कमजोर करने का आरोप भी उसी पर लगता है।
नायक के अनुसार वर्ष 2014 में भाजपा द्वारा कहा गया था कि हर साल दो करोड़ नौकरियां पैदा होंगी। यदि यह वादा पूरा होता तो 12 वर्षों में करोड़ों युवाओं को रोजगार मिल चुका होता। लेकिन आज देश का युवा नौकरी के लिए भटक रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, रिक्त पदों पर नियुक्तियों में देरी और रोजगार के अवसरों की कमी युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।
उन्होंने कहा कि किसानों से आय दोगुनी करने का वादा किया गया था। लेकिन किसानों को अपनी मांगों के लिए दिल्ली की सीमाओं पर महीनों आंदोलन करना पड़ा। तीन कृषि कानूनों को किसानों के हित में बताया गया, लेकिन जब लाखों किसान सड़कों पर उतर आए तो सरकार को उन्हें वापस लेना पड़ा। यह भाजपा सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पराजयों में से एक थी। उन्होंने कहा कि महंगाई पर नियंत्रण का दावा किया गया था। लेकिन रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, खाद्य पदार्थ, दाल, तेल और रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी। आम रहिवासी की आय जितनी नहीं बढ़ी, उससे कहीं अधिक उसकी जिंदगी महंगी हो गई।
पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा नोटबंदी पर कटाक्ष करते हुए नायक ने कहा कि नोटबंदी को काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम बताया गया था, लेकिन परिणाम क्या निकला? लगभग पूरी नकदी बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आई। छोटे व्यापार चौपट हो गए। लाखों मजदूर बेरोजगार हो गये। असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ। अर्थव्यवस्था की रफ्तार प्रभावित हुई। देश की जनता ने घंटों लाइन में खड़े होकर कष्ट झेला, वादे के अनुरूप परिणाम कभी सामने नहीं आए। उन्होंने कहा कि इतिहास नोटबंदी को आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि आर्थिक अव्यवस्था के रूप में याद रखेगा।
नायक ने कहा कि मोदी सरकार द्वारा जीएसटी को ऐतिहासिक कर सुधार बताया गया था, लेकिन छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए यह जटिल अनुपालन और बढ़ती कागजी प्रक्रिया का प्रतीक बन गया। बड़े कॉरपोरेट समूहों के पास संसाधन थे, लेकिन छोटे दुकानदारों और लघु उद्योगों को इसका भारी बोझ उठाना पड़ा।
नायक ने कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार ने मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाओं का व्यापक प्रचार किया। सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं ने उतने रोजगार पैदा किए जितने वादे किए गए थे? कहा कि आज स्मार्ट सिटी परियोजनाएं अधूरी हैं। बुलेट ट्रेन अभी तक सपना बनी हुई है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। चीन पर निर्भरता कम करने के दावे भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके।
नायक के अनुसार भाजपा शासन का मॉडल विकास से अधिक विज्ञापन आधारित शासन का मॉडल बन गया, जहां उपलब्धि से ज्यादा उसका प्रचार महत्वपूर्ण हो गया। कहा कि कोविड महामारी के दौरान देश ने भयावह दृश्य देखे। लाखों प्रवासी मजदूर पैदल घर लौटने को मजबूर हुए। ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में अव्यवस्था और स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरियां उजागर हुईं। महामारी ने दिखा दिया कि चमकदार प्रचार और वास्तविक प्रशासनिक तैयारी में कितना अंतर हो सकता है।
उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार पर सबसे गंभीर आरोप लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर करने का है। विपक्ष का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ हथियार की तरह किया गया। संसद में बहस की परंपरा कमजोर हुई। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसका प्रचार करना अधिक उचित समझा।
नायक के अनुसार लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है असहमति का सम्मान, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही। कहा कि सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास का नारा दिया गया था। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि पिछले वर्षों में समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा है। बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक संकट जैसे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए धार्मिक और सांप्रदायिक बहसों को लगातार राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया। कहा कि जब रोजगार का प्रश्न उठता है तो धर्म की चर्चा शुरू हो जाती है। जब महंगाई पर सवाल उठता है तो नया भावनात्मक मुद्दा सामने आ जाता है। यह लोकतांत्रिक विमर्श के लिए शुभ संकेत नहीं है।
उन्होंने कहा कि सरकार की अग्निपथ योजना ने लाखों युवाओं के मन में भविष्य को लेकर असुरक्षा पैदा कर दी है। दूसरी ओर विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं का विश्वास तोड़ा है। एक ऐसा देश जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, वहां युवाओं का निराश होना सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंता का विषय होना चाहिए।
नायक के अनुसार भाजपा के 12 वर्षों का मूल्यांकन करते समय देश को विज्ञापनों, नारों और राजनीतिक अभियानों से ऊपर उठकर वास्तविकताओं को देखना होगा। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, नोटबंदी की विफलता, जीएसटी की जटिलता, कोविड की त्रासदी, सामाजिक ध्रुवीकरण, संस्थाओं पर सवाल और अधूरे वादे ये सभी ऐसे मुद्दे हैं जिन पर जवाब मांगा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की जनता इतिहास बदलने की कोशिशों से प्रभावित नहीं होगी। जनता अपने जीवन की वास्तविकताओं के आधार पर फैसला करेगी। देश पूछ रहा है दो करोड़ नौकरियां कहां हैं?
किसानों की दोगुनी आय कहां है? 15 लाख रुपये कहां हैं? महंगाई पर नियंत्रण कहां है? भ्रष्टाचार मुक्त शासन कहां है? 12 साल बाद भी यदि इन सवालों का जवाब नहीं है, तो फिर यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रचार रही है और सबसे बड़ी विफलता जनता की उम्मीदों को पूरा न कर पाना।
नायक के अनुसार अब इतिहास पर कब्ज़ा नहीं, जनता को जवाब चाहिए। भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए। अब देश में ऐसी राजनीति होनी चाहिए जिससे रोजगार पैदा किया जा सके। महंगाई को कम किया जा सके।
किसानों, छात्रो, युवाओ, महिलाओ, गरीब गुरबो और खासकर दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अल्पसंख्यक मजदूरों को राहत मिल सके तथा संविधान व लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करे। कहा कि अंततः लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है। प्रचार, छवि निर्माण और राजनीतिक नैरेटिव कितने भी मजबूत हों, जनता का अनुभव और जीवन की वास्तविकता ही किसी सरकार की असली परीक्षा तय करती है।
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