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व्यवस्था से ही समाज चलता है-गणेशाचार्य

एस. पी. सक्सेना/बोकारो। नरसिंहपुर गोरेगांव बाबा स्वतंत्र परमधाम मध्य प्रदेश से पधारे गणेश आचार्य महाराज ने 17 मार्च की देर संध्या बोकारो जिला के हद में जारंगडीह रिवर साइड कॉलोनी में पत्रकारों से एक भेंट में मानव जीवन के उच्च आदर्शों एवं विचारों को बताया।

जारंगडीह स्थित दुर्गा मंडप प्रांगण में आयोजित नह्वान परायण यज्ञ में पधारे महाराज जी ने बताया कि कहीं भी व्यवस्था से ही समाज संचालित होता है। व्यवस्था में कमी से समाज छिन्न-भिन्न हो जाता है। उन्होंने कहा कि धर्म शाश्वत सनातन है। धर्म अच्छे रास्ते पर चलने का मार्ग है। धर्म मर्यादा बंधन से इंसान को जोड़ता है।

हिंदुत्व हीं सनातन है। सिंधु तट वासी हिन्दू सनातनी हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति जब धर्म से विमुख होता है, तो व्यवस्था बिगड़ जाता है। क्योकि धर्म हीं आस्था है। आस्था मर्यादा है। सनातनी हैं। नीतिगत है। कल्याण है। अधर्म करने वाले आस्था नहीं रखते हैं। अधर्मी में आस्था का अभाव रहता है। धर्म में आस्था रखना सुंदर व्यवस्था है।

महाराज जी ने कहा कि हम सभी ईश्वर वादी हैं। ईश्वर में आस्था रखते हैं। ईश्वर निरंकार अविनाशी हैं। जब-जब धर्म की हानि होती है, तब तब ईश्वर कोई ना कोई रूप में अवतार लेते हैं और राक्षस रूपी रावण का नाश करते हैं। उन्होंने समाज में व्यवस्था कायम रखने के लिए वंश परंपरा को उचित बताया।

उन्होंने कहा कि एक पिता के 4 पुत्र हुए, जिसमें बड़ा पुत्र को ज्ञान वाचन के लिए ब्राह्मण रूप दिया गया। दूसरे को रक्षक रूप में क्षत्रिय बनाया गया। तीसरे को कार्य रूप में वैश्य और सबसे छोटे पुत्र को सेवक। जो आज भी भारतीय परंपरा के अनुसार सेवक रूप हैं। वे सभी बड़ो की सेवा करते हैं।

अपने से बड़ों की सेवा करना कहीं से गलत नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि कोई अपने आचरण के विरुद्ध कार्य करता है तो वह ब्राह्मण होते हुए भी कर्म से राक्षस प्रवृत्ति को पाता है। उसकी सम्मान की हानि होती है। रावण ब्राह्मण होते हुए भी गलत कार्य करने के कारण राक्षस कहलाया।

हमें स्वयं के अलावा पड़ोसी के माँ बहनों के साथ आदर भाव रखना चाहिए। जो इंसान अपनी मां, बहन, बेटी, साधु तक को नहीं पहचानते वह राक्षस रूप होते हैं। रावण अपने कर्म के अनुसार प्रतिवर्ष जलाया जाता है।

महाराज जी ने कहा कि वर्तमान में हमारे देश में फैली राजनीतिक व्यवस्था जातिवाद फैला रहा है। इससे दूर रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि एक तरफ कुछ लोग जातिवाद का विरोध करते हैं, दूसरी ओर जब लाभ मिलने की बारी आती है तो प्रमाण पत्र लेने चले जाते हैं। ऐसे व्यक्ति स्वार्थी होते हैं। उन्होंने कहा कि परमात्मा निराकार है, लेकिन जब भी धर्म की हानि होती है, तो परमात्मा किसी न किसी रूप में साकार रूप लेकर धर्म की रक्षार्थ कार्य करते हैं।

महाराज जी ने पांच और पचीस के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि पांच तत्व से इस शरीर निर्मित हुआ है। जिसमें 10 कर्मेइंद्रियां और 10 ज्ञानेंद्रियां हैं।यही पांच पचीस है। इससे उच्च स्थान पर पहुंचने वाले ही समाज में सम्मान के पात्र होते हैं। उन्होंने मन पर संतुलन के लिए भजन, कीर्तन और सत्संग करने की सलाह दी।

जिससे आत्मा परमात्मा में लीन होकर शुद्ध मानव स्वरूप को प्राप्त कर सके। मौके पर महाराज जी के साथ जारंगडीह यज्ञ समिति के ललेंद्र ओझा, रामदास केवट, श्याम सिंह, धीरज कुमार, समाजसेवी श्याम सिंह की धर्मपत्नी सुषमा देवी आदि उपस्थित थे।

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