Advertisement

चुनाव हारे, लेकिन जनता का साथ नहीं छोड़ा-पूर्व मुखिया सिकंदर कपरदार

गर्री पंचायत के पूर्व मुखिया अपने स्तर से बंद चापाकलों की करा रहे मरम्मत

रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। पूर्व में संपन्न पंचायत चुनाव में हार-जीत के बाद भी बोकारो जिला के हद में कसमार प्रखंड के गर्री पंचायत के पूर्व मुखिया सिकंदर कपरदार का ग्रामीणों से जुड़ाव बरकरार है। चुनाव हारने के बावजूद वे लगातार रहिवासियों के बीच रहकर उनकी समस्याओं को सुन रहे हैं और जरूरत के समय अपने स्तर से मदद करने में जुटे हैं।

इन दिनों पंचायत क्षेत्र में पेयजल की समस्या को देखते हुए पूर्व मुखिया कपरदार ने बंद पड़े चापाकलों की मरम्मत अपने स्तर से कराने का बीड़ा उठाया है। बताया जाता है कि पंचायत के विभिन्न गांवों में कई चापाकल खराब पड़े होने से ग्रामीणों को पेयजल के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। इसकी जानकारी मिलने पर पूर्व मुखिया संबंधित स्थलों पर पहुंचकर स्थिति का जायजा ले रहे हैं और अपने स्तर से खराब चापाकलों को बनवाकर चालू कराने का प्रयास कर रहे हैं। उनके इस प्रयास से जरूरतमंद ग्रामीणों को राहत मिलने लगी है।

एक भेंट में पूर्व मुखिया सिकंदर कपरदार ने 12 सितंबर को कहा कि चुनाव में हार-जीत अपनी जगह है, लेकिन आमजनों के सुख-दु:ख में साथ खड़ा रहना उनकी जिम्मेदारी है। कहा कि ग्रामीणों ने मुझे सेवा करने का मौका दिया है, इसलिए आज भी उनकी समस्याओं को अपनी समस्या समझता हूं। पेयजल रहिवासियों की बुनियादी जरूरत है। गरीब परिवारों को पानी के लिए परेशान होते देख चुप नहीं बैठ सकता। जहां भी बंद चापाकल की जानकारी मिल रही है, उसे अपने स्तर से बनवाकर चालू कराने का प्रयास कर रहा हूं।

उन्होंने कहा कि पंचायत के मतदाताओं ने भले ही चुनाव में अपना प्रतिनिधि बदल दिया हो, लेकिन उनके प्रति उनका स्नेह और लगाव कभी कम नहीं होगा। पंचायत के गरीब, मजदूर और जरूरतमंद परिवारों की मदद के लिए वे आगे भी अपनी क्षमता के अनुसार काम करते रहेंगे। पूर्व मुखिया के इस नेक पहल की ग्रामीणों ने सराहना की है।

ग्रामीणों का कहना है कि पेयजल जैसी गंभीर समस्या के समय किसी माध्यम अथवा अपने स्तर से आगे बढ़कर चापाकल की मरम्मत कराना सराहनीय कदम है। इससे ग्रामीणों को पानी के लिए दूर-दराज जाने की परेशानी से राहत मिल रही है। कपरदार का यह प्रयास चुनावी राजनीति से अलग जनसेवा और ग्रामीणों के प्रति उनकी जिम्मेदारी का उदाहरण माना जा रहा है। चुनाव परिणाम के बाद भी आमजनों के बीच रहकर उनकी समस्याओं के समाधान में जुटे रहना क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।

 

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *