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विश्व प्रेस-स्वतंत्रता दिवस पर स्वतंत्र पत्रकार उमेश जोशी की सशक्त प्रस्तुति

प्रहरी संवाददाता/पेटरवार (बोकारो)। देश के तमाम कलमकार को 3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की सस्नेह अभिवादन। यह दिन शुभ हो, मंगलकारी हो, कल्याणकारी हो। सभी स्वस्थ रहें और प्रसन्न रहे।

देश की राजधानी दिल्ली के स्वतंत्र पत्रकार व् स्तंभकार उमेश जोशी के अनुसार पत्रकार होने के नाते मेरे लिए आज का दिन ख़ास है। आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है, जो हर वर्ष 3 मई को मनाया जाता है। इसकी औपचारिक शुरुआत वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने की थी। वर्ष 1991 की ऐतिहासिक विंडहोक घोषणा (विंडहोक डिक्लेरेशन) में इस तरह का दिवस मनाने की सिफारिश/सुझाव था।

इस घोषणा ने स्वतंत्र, निष्पक्ष और बहुलतावादी मीडिया की आवश्यकता को वैश्विक स्तर पर रेखांकित किया। यह दिवस हमें प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व, मीडिया की जिम्मेदारियों और पत्रकारों की सुरक्षा के प्रति जागरूक करता है। इस वर्ष 2026 का थीम है शांतिपूर्ण भविष्य का निर्माण: सत्य, स्वतंत्रता और डिजिटल युग में जवाबदेही। यह विषय हमें याद दिलाता है कि तेजी से बदलते डिजिटल दौर में भी पत्रकारिता का मूल आधार सत्य, संतुलन और समाजहित/जनहित ही रहना चाहिए।

इत्तेफाक से आज विश्व हास्य दिवस भी है। यह दिवस हर साल मई महीने के पहले रविवार को मनाया जाता है। संयोग से आज 3 मई और मई महीने का पहला रविवार भी है। इस संयोग से प्रेस स्वतंत्रता पर बहुत हसा हूँ। आप भी, यदि प्रेस की स्वतंत्रता के मायने समझते हैं तो हास्य योग कर सकते हैं। मेरा मानना है कि जैसे ही प्रेस की स्वतंत्रता के मायने समझ में आएँगे, हास्य योग सायास नहीं करना पड़ेगा; स्वतः हँसी फूट पड़ेगी। यह दिन हँसी के स्वास्थ्य लाभों और सकारात्मकता को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है।

इसकी शुरुआत 10 जनवरी वर्ष 1998 को डॉ मदन कटारिया ने मुंबई में की थी। यह दिन तनाव कम करने, स्वास्थ्य सुधारने और आमजनों को एक साथ जोड़ने के लिए दुनिया भर में उत्साह के साथ मनाया जाता है। अब हास उपहास से हटकर फिर से विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की ओर लौट रहा हूँ। एक पत्रकार के रूप में 21 वर्षों की मेरी प्रिंट मीडिया की यात्रा में मैंने स्वतंत्र अभिव्यक्ति की शक्ति को बहुत गहराई से महसूस किया है। प्रिंट के अलावा टीवी में लगभग 30 वर्ष और रेडियो में लगभग 16 वर्ष का अनुभव है। सौभाग्य से 21 वर्षों की प्रिंट मीडिया की यात्रा में सेंसरशिप के नाम पर 21 शब्द भी नहीं रोके गए; 21 वाक्य तो बहुत दूर की बात है।

स्वतंत्र पत्रकार प्रभाष जोशी को कोटि-कोटि नमन है, जिन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता पर कभी संकट नहीं आने दिया। मेरी तरह उस दौर के सभी जनसत्ताई (जनसत्ता में काम करने वाले सभी साथी) प्रेस की स्वतंत्रता का रसास्वादन कर चुके हैं और इस मायने में वे सभी सौभाग्यशाली हैं। अब तो वैसी प्रेस की स्वतंत्रता कल्पनाओं में भी नहीं आती है; न जाने क्यों कल्पना में भी आने से डरती है। यह स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा और जनविश्वास की नींव है।
आइए, हम सब मिलकर सत्य, निष्पक्षता और निर्भीकता के इन मूल्यों को सहेजने का संकल्प लें। आप सभी को पुनः शुभकामनाएँ, आपका दिन मंगलमय हो।

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