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नहाय-खाय के साथ लोक आस्था का प्रतीक चार दिवसीय चैती छठ व्रत शुरू

व्रतियों ने पूर्ण की विभिन्न नदी घाटों पर प्रथम दिन का अनुष्ठान

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में सोनपुर अंचल में श्रद्धालुओं द्वारा लोक आस्था का प्रतीक चार दिवसीय चैती छठ महापर्व प्रारम्भ किया गया।

बताया जाता है कि चैती छठ के प्रथम दिन 22 मार्च को व्रतियों ने विधि विधान के साथ नहाय-खाय के साथ प्रथम दिन का अनुष्ठान पूर्ण किया। व्रतियों ने सुबह जल्दी उठकर सुविधानुसार गंगा, नारायणी सहित पवित्र तालाबों व् विभिन्न स्थानों पर स्नान किया।

ज्ञात हो कि इस अवसर पर जो व्रती नदी में स्नान करने नहीं जा सके, उन्होंने घर में ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान किया। साथ हीं घर की शुद्धि की गई। स्नान के बाद पूरे घर और विशेष रूप से रसोई की साफ-सफाई की गई। सभी बर्तनों को भी शुद्ध जल से साफ किया गया। इसके बाद सात्विक भोजन के रुप में व्रतियों ने अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू (लौकी) की सब्जी बनाई। सब्जी और दाल में सेंधा नमक का उपयोग किया गया, क्योंकि समुद्री नमक को अशुद्ध माना जाता है।

छठ व्रत के प्रथम दिवस सर्वप्रथम व्रतियों ने सात्विक भोजन को ग्रहण किया। उसके बाद परिवार के अन्य सदस्य भोजन किए। अब 23 मार्च को व्रत के दूसरे दिन खरना एवं 24 को मार्च संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को) दिया जाना है। वहीं आगामी 25 मार्च को उषा अर्घ्य (उगते सूर्य) को अर्घ्य के साथ व्रत का समापन होगा।

धर्म, अध्यात्म और विज्ञान का गहरा संगम है सूर्य षष्ठी व्रत-आचार्य सुशीलचंद्र शास्त्री

सारण जिला के हद में विश्व प्रसिद्ध सोनपुर स्थित बाबा हरिहरनाथ मंदिर के मुख्य अर्चक आचार्य सुशीलचंद्र शास्त्री ने चैती छठ के संबंध में कहा कि सूर्य षष्ठी व्रत धर्म, अध्यात्म और विज्ञान का गहरा संगम है। यह भारतीय संस्कृति का एक अनूठा महापर्व है। इस महापर्व का आध्यात्मिक आधार आत्म-शुद्धि और मानसिक नियंत्रण पर टिका है। साथ ही यह इन्द्रिय संयम का सबसे बेहतरीन पर्व है। बताया कि 36 घंटे का निर्जला उपवास और कड़े नियम साधक को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना सिखाते हैं। उन्होंने बताया कि जल में खड़े होकर सूर्य की किरणों का स्वागत करने से शरीर में कॉस्मिक सोलर एनर्जी का संचार होता है, जिससे मानसिक स्पष्टता और आंतरिक शांति प्राप्त होती है।

उन्होंने कहा कि यह पर्व ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाता है। घाट पर राजा और रंक दोनों एक साथ मिट्टी के चूल्हे पर प्रसाद बनाते हैं और प्रकृति की गोद में प्रार्थना करते हैं। छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्य देव और उनकी शक्ति छठी मैया को समर्पित है। कहा कि पुराणों के अनुसार, छठी मैया ब्रह्मा जी की मानस पुत्री और भगवान कार्तिकेय की पत्नी हैं। उन्हें संतान की रक्षा और समृद्धि की देवी माना जाता है। चैत्र नवरात्रि एवं हिंदू विक्रमी नव संवत्सर में तो इस पर्व की महिमा और भी बढ़ जाती है।

दूसरी ओर हरिहरनाथ मंदिर के पुजारी पवनजी शास्त्री बताते हैं कि वनवास से लौटने के बाद भगवान श्रीराम और माता सीता ने सूर्य देव की उपासना की थी। सूर्यपुत्र कर्ण प्रतिदिन कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। पांडवों ने भी अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने के लिए द्रौपदी के साथ यह व्रत किया था। संतान प्राप्ति के लिए राजा प्रियव्रत ने देवी षष्ठी की पूजा की थी, जिससे उन्हें मृत पुत्र के जीवित होने का वरदान मिला।

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