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पंचांग दैनिक जीवन को धर्म, ज्योतिष व् खगोलशास्त्र से जोड़नेवाला सेतु-लक्ष्मणाचार्य

ज्योतिषाचार्य एवं ब्राह्मण आचार्य धारण करेंगे आज नया पंचांग

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। देश के ज्योतिषाचार्य एवं ब्राह्मण आचार्य 19 मार्च को चैत्र शुक्ल वर्ष प्रतिपदा 2083 के पावन अवसर पर नया पंचांग धारण करेंगे। पंचांग एक मात्र धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय खगोलशास्त्र, ज्योतिष, समय-विज्ञान और आध्यात्मिक अनुशासन का जीवंत उदाहरण है। साथ ही, हमारे दैनिक जीवन को धर्म, ज्योतिष और खगोलशास्त्र से जोड़ने वाला सेतु भी है।

जब भी कोई शुभ कार्य की योजना बनाई जाती है, सबसे पहले जो चीज देखी जाती है, वह है पंचांग। पंचांग केवल एक कैलेंडर नहीं है, यह हिंदू जीवन पद्धति का वैज्ञानिक, खगोलीय और आध्यात्मिक समन्वय है। उक्त बातें 18 मार्च को सारण जिला के हद में हरिहरक्षेत्र श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम दिव्य देश नौलखा मंदिर पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज ने कही। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्योतिष और ब्राह्मणों के लिए नया पंचांग धारण करने और हिंदू नववर्ष (नव संवत्सर) के आरंभ की तिथि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा है। यह पंचांग परिवर्तन दिवस सह नया पंचांग धारण दिवस भी है। ब्राह्मण और ज्योतिषी इस दिन नए संवत्सर का पंचांग (जैसे विक्रम संवत 2083) विधिवत पूजन के बाद उपयोग में लाना शुरू करते हैं।

स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने बताया कि सनातन धर्म में हर पर्व, व्रत, पूजा, यात्रा, विवाह, गृह प्रवेश या किसी भी विशेष अनुष्ठान का निर्णय पंचांग देखकर ही लिया जाता है। यह एक ऐसा ज्ञान है जो हजारों वर्षों से पीढ़ियों के माध्यम से संरक्षित है और आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने बताया कि पंचांग की उत्पत्ति वैदिक युग में हुई जब ऋषि-मुनियों ने सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्रों और ग्रहों की गति को ध्यान में रखते हुए समय को मापने की विधि विकसित की। कहा कि ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद जैसे प्राचीन ग्रंथों में तिथि, नक्षत्र और ऋतुओं का उल्लेख मिलता है।

इसके बाद सूर्य सिद्धांत जैसे वैज्ञानिक ग्रंथों ने समय की खगोलीय गणना को एक ठोस आधार दिया, जिसे आगे आर्यभट्ट, वराहमिहिर और भास्कराचार्य जैसे विद्वानों ने विकसित किया। उन्होंने दिन, घड़ी, नाड़ी, मुहूर्त जैसी समय की सूक्ष्म इकाइयां परिभाषित की, जो पंचांग के निर्माण में आज भी उपयोग होती हैं। पुराणों और ज्योतिषीय ग्रंथों में पंचांग का उपयोग धार्मिक दृष्टि से किया गया। कहा कि बृहत संहिता, नारद संहिता, गरुड़ पुराण आदि में तिथियों, नक्षत्रों और योगों के साथ देवी-देवताओं के संबंध और उनके प्रभाव का विस्तृत वर्णन मिलता है। इससे यह स्पष्ट है कि पंचांग केवल समय मापन का साधन नहीं, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों और आस्थाओं से जुड़ा एक शास्त्र है।

उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में पंचांग बनाने की परंपरा अत्यंत वैज्ञानिक होती थी, जिसमें स्थान-विशेष के सूर्योदय-सूर्यास्त, चंद्र स्थिति और ग्रह गोचर के अनुसार गणना की जाती थी। उन्होंने बताया कि सनातन परंपरा में किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के लिए शुभ मुहूर्त देखना अनिवार्य होता है। यही कार्य पंचांग करता है। पंचांग के माध्यम से किस दिन कौन-सा व्रत या पर्व मनाया जाए, कौन-सा समय पूजा के लिए उत्तम है? ग्रहण, संक्रांति, एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या कब है? विवाह, नामकरण, अन्नप्राशन, गृह प्रवेश जैसे कार्य कब करें, आदि की सटीक जानकारी मिलती है। कहा कि अगर किसी को सत्यनारायण व्रत करना है तो पंडित पंचांग देखकर शुभ तिथि, वार और नक्षत्र मिलाकर उचित मुहूर्त निकालते हैं। इस प्रकार पंचांग हमारे दैनिक जीवन को धर्म, ज्योतिष और खगोलशास्त्र से जोड़ने वाला सेतु है।

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