एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। आदिवासी–मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक ने झारखंड सरकार द्वारा पेसा कानून के कार्यान्वयन में लगातार हो रही देरी पर गहरी नाराज़गी व्यक्त की है।
नायक ने 22 नवंबर को जारी विज्ञप्ति में कहा कि पेसा सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि झारखंडी समाज के अस्तित्व, पहचान और स्वशासन का मूलाधार है। सरकार की चुप्पी और अस्पष्ट रुख सीधे तौर पर जनता की ग्रामसभा-आधारित परंपरागत सत्ता को कमजोर करता है। उन्होंने कहा कि सरकार किसके दबाव में काम कर रही है, यह राज्य की जनता जानना चाहती है।
नायक ने कहा कि पेसा कानून लागू करने से सबसे ज़्यादा प्रभावित वे क्षेत्र होंगे, जहाँ खनन और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रियाएँ तेज़ हैं। यही कारण है कि समाज में यह गहरी आशंका है कि सरकार कहीं खनन कॉरपोरेट दबाव में तो नहीं है। कहा कि सरकार स्पष्ट करे कि वह किसके दबाव में पेसा पर ठोस कदम नहीं उठा रही है। जिससे आज ग्राम सभाओं को अधिकार नहीं है।
नायक ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा बार-बार बयान दिए जा रहे हैं, लेकिन आज तक पेसा कानून लागू करने की अधिसूचना जारी नही की गयी। सरकार का ग्राम सभा सशक्तिकरण के नियम तथा ज़मीनी स्तर पर पंचायतों की भूमिका पर कोई ठोस स्पष्टता नहीं है, जिससे झारखंडी जनता असमंजस में पड़ी है।
उन्होंने कहा कि सरकार की यह धीमी प्रक्रिया ग्राम सभाओं को अधिकार देने के बजाय एक संवैधानिक अधिकार को लटकाने का प्रयास लगता है। पेसा नहीं लागू तो अस्तित्व संकट और बड़ा होगा। अपने बयान में नायक ने कहा कि पेसा झारखंडी समाज के लिए सिर्फ विकास नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल है। बिना पेसा के जमीन छीनी जाएगी, खनिज बाहर जाएगा और झारखंडी समाज और अधिक हाशिये पर चले जायेंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार और देरी करती रही तो आने वाले वर्षों में व्यापक रूप से विस्थापन बढ़ेगा। परंपरागत शासन कमजोर होगा और खनिज आधारित लूट और भी तेज़ होगी। सरकार को स्पष्ट संदेश है कि अभी नहीं, तो कभी नहीं।
नायक ने कहा कि झारखंड की हेमंत सरकार के लगातार दूसरे कार्यकाल का पहला वर्ष पूरा होने जा रहा है, इसलिए यह समय निर्णायक है और झारखंडी समाज के आकांक्षाओ का प्रतीक भी है।यदि सरकार सच में झारखंडी समाज के साथ है, तो उसे आगामी 28 नवंबर से पहले या तुरंत बाद पेसा लागू करने की स्पष्ट तिथि घोषित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार चुप्पी बरकरार रखती है तो आदिवासी–मूलवासी संगठन राज्यव्यापी जन-अभियान चलाने पर विचार करेंगे। उन्होंने कहा कि जनता अब और इंतजार करने को तैयार नहीं है।
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