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दीदारगंज से मिली तृतीय शताब्दी ईशा पूर्व मौर्यकाल यक्षिणी (यक्षी) का मेला में दीदार

वास्तुकला प्रतिरूप को खूबसूरती को देख मेला दर्शक हो रहे मोहित

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला में लगी बिहार सरकार के कला संस्कृति एवं युवा विभाग की प्रदर्शनी में पटना के दीदारगंज की अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त यक्षिणी की मूर्ति प्रदर्शनी के पट खुलने के साथ ही मेला दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है। उस मूर्ति को भारतीय मूर्ति कला का एक अद्वितीय एवं उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

वास्तुकला का प्रतिरोप के दाहिने हाथ में चौरी है, जबकि बायां हाथ टूटा है। इसके बालों को बड़ी ही कुशलता के साथ संवारा गया है। साथ ही माथे पर मांग टीका, कानों में कर्णाभूषण, मोतियों वाला हार, पांच लड़ियों वाली करधनी और पायल पहने प्रदर्शित है। इस मूर्ति को संभवतः आज से लगभग 2000 – 2300 साल पहले मौर्य शासन काल के दौरान बनाया गया था।

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिला के हद में चुनार के बलुए पत्थर से निर्मित एवं मौर्यकालीन विशेष पॉलिश से युक्त यह आदमकद मूर्ति वर्ष 1917 में पटना के दीदारगंज में गंगा नदी के तट के पास मिली थी। यक्षी की यह मूर्ति संस्कृत और पाली ग्रंथों में वर्णित सौंदर्य के विभिन्न पैमानों पर खड़ा उतरती है। इस मूर्ति के अवलोकन से आप भंलि-भांति मौर्यकालीन उत्कृष्ट मूर्तिकला शैली को समझ सकते हैं। अब यह मूर्ति पटना संग्रहालय में प्रदर्शित है।

इसकी लंबाई लगभग 5 फीट 2 इंच है। इतिहासकार इसकी मुस्कान, मातृत्व और सेवा भाव की प्रशंसा करते हैं। इसकी कलाकृतियां, जैसे कि जटिल आभूषण और बारीक नक्काशी, मगध के कलाकारों की उच्च कोटि की शिल्पकला का प्रमाण है।

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