एस. पी. सक्सेना/पटना (बिहार)। बिहार की राजधानी पटना के प्रेमचंद रंगशाला में 17 सितंबर को नाट्य समारोह के दूसरे दिन बंद गली का आखिरी मकान नाटक का मंचन किया गया। उक्त जानकारी कलाकार साझा संघ के सचिव एवं टीवी कलाकार मनीष महीवाल ने दी।
उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल का रंग षष्ठी नाट्य समारोह के दूसरे दिन रंगमंडल प्रमुख राजेश सिंह ने दर्शकों एवं अतिथियों का अभिनंदन किया।सिंह ने कहा कि यह बिहार यात्रा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की 60वीं वर्षगांठ (हीरक जयंती) समारोह का हिस्सा है। यह समारोह बीते वर्ष अगस्त 2024 से शुरू होकर अगले वर्ष 2026 तक चलेगा। इस दौरान मंडली भारत के विभिन्न शहरों और देशों में नटको की प्रस्तुति कर चुकी है। इसी कड़ी में प्रस्तुत है आज का नाटक बंद गली का आखिरी मकान। कहानी है धर्मवीर भारती की और देवेंद्र राज अंकुर ने निर्देशित किया है।
महीवाल के अनुसार नाटक बन्द गली का आख़िरी मकान नाटक बहुत दिलचस्प ढंग से प्रस्तुत है। कथासार के अनुसार वर्षों तक साहित्य में कहानी, नयी कहानी, साठोत्तरी कहानी, अकहानी आदि को लेकर बहस चलती रहे। लिखने वाला चुप रहे। वर्षों तक चुप रहे और फिर चुपके से एक कहानी लिखकर प्रकाशित करा दे। वही उसका घोषणा- पत्र हो, गोया उसने सारे वाद-विवाद के बीच एक रचनात्मक कीर्तिमान स्थापित कर दिया हो, कि देखो यह है कहानी।

बन्द गली का आखिरी मकान प्रकाशित होने पर जो तमाम पत्र लेखक को मिले यह उन्हीं में से एक पत्र का अंश है। क्या है यह बन्द गली का आखिरी मकान? जो एक लम्बी चुप्पी के बाद अपने प्रकाशन के साथ ही सबके मुँह बंद करा देती है। … कहानी! हां, कहानी ही… यह कहानी डॉ धर्मवीर भारती की सभी कहानियों में सबसे अधिक लम्बी है। कहानी की इकाई की अपेक्षा वस्तुतः यह एक उपन्यासिका है, जिसका कथानक बीस कथा खण्डों में विभाजित है।
प्रारम्भ प्रमुख पात्र मुंशीजी की लम्बी बीमारी के एक दिन से होता है और धीरे-धीरे मुंशीजी के माध्यम से ही विविध पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों का नये-नये अर्थों में रहस्योद्घाटन होता है। एक तरफ मुंशीजी हैं, दूसरी तरफ पंद्रह वर्ष पहले पति का घर छोड़ कर अविवाहित मुंशीजी के आसरे में आई बिरजा है। मुंशीजी कायस्थ है, तो बिरजा ब्राह्मण।
बिरजा की माँ हरदेई है, जो मुंशीजी में भगवान का दर्शन करती है। बिरजा का बड़ा बेटा राघोराम साक्षात गऊ है, उसके व्यक्तित्व में पितृभक्ति भरी है। वहीं दूसरा बेटा हरिराम जनम का चोर है, जो अपने आचार व्यवहार से सभी के लिए परेशानी खड़ी करता रहता है। इनके अलावा मुंशीजी से संबंधित और भी कई पात्र हैं। उनके जीवन से जुड़े हुए, दुःख-सुख-संवेदनाओं के भागीदार, जो अतीत संबंधी स्मृति प्रसंगों में बार-बार आते रहते हैं। परिस्थितियाँ बनती बिगड़ती रहती हैं फिर स्वयं ही अपने लिए एक निश्चित नियामक का निर्धारण कर लेती हैं। जीवन चक्र जहाँ से आरम्भ होता है वही उसका अन्त हो जाता है।
कहानी का घटना स्थल वह कच्चा मकान है, जो गली के अन्त में है। जहां आकर गली बंद हो जाती है। इस मकान के समान हीं मुंशीजी की स्थिति है। कथा का अन्त आते आते मुंशीजी की नियति भी बन्द गली के आखिरी मकान की तरह हो जाती है। बन्द और सीमित।
महीवाल ने बताया कि नाटक के पात्र मुंशीजी आलोक रंजन एवं राजेश सिंह, बिरजा शिल्पा भारती, हरदेई पूजा गुप्ता, हरिराम सत्येन्द्र मल्लिक, राघो राम अनंत शर्मा, भवनाथ शिव प्रसाद गोंड, छोटी बहू मधुरिमा तरफदार, बिटौनी मेहरुनिसा शिवानी भारतीय, वकील, महाराज, वैद्य हीरालाल रॉय, इसाक मियां व् बिशन मामा सुमन कुमार हैं। नाटक के मीडिया प्रभारी मनीष महिवाल, रंगमंडल प्रमुख राजेश सिंह, कहानीकार धर्मवीर भारती तथा निर्देशक देवेंद्र राज अंकुर हैं।
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