एस. पी. सक्सेना/बोकारो। संपूर्ण क्रांति दिवस 5 जून के अवसर पर बोकारो के सेक्टर थर्ड डी में संपूर्ण क्रांति के बिना समाज की समस्याओं का निराकरण संभव नहीं पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया।
कर्मचारी पंचायत कार्यालय में आयोजित गोष्ठी को संबोधित करते हुए उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि आज से 51 वर्ष पहले 5 जून 1974 को बिहार के विद्यार्थियों द्वारा मांगों को लेकर 18 मार्च को शुरू हुआ आंदोलन समाज परिवर्तन का रूप लिया। उसी दिन पटना के गांधी मैदान में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इसे संपूर्ण क्रांति का आंदोलन करार दिया। फिर उन्होंने एक जनवरी 1975 को छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी नामक संगठन बनाने की घोषणा की, जिसका लक्ष्य संपूर्ण क्रांति को जमीन पर उतारना था।
पांच जून को जेपी ने गांवों से जुड़ने, जनता को जागरूक करने, संगठित करने का दायित्व सौंपा। उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति का उद्घोष करते हुए कहा था कि भ्रष्टाचार, मंहगाई और बेरोजगारी का निवारण और शिक्षा में परिवर्तन हो। लेकिन समाज में आमूल परिवर्तन हुए बिना भ्रष्टाचार, मंहगाई, बेरोजगारी का खत्म होना संभव नहीं है। उन्होंने संपूर्ण क्रांति के मुख्य आयाम भी बताया जिसमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, वैचारिक, शैक्षणिक और नैतिक क्रांति के साथ में डॉ लोहिया के सप्त क्रांति की बात कही और लोहिया के नर-नारी समता को जोड़ दिया।
बताया गया कि जेपी ने कहा था कि क्रांति का कोई ब्ल्यू प्रिंट नहीं होता, हर क्रांति अपना स्वरूप और तरीका खुद तय करती है। हाँ, सम्पूर्ण क्रांति शांतिमय होगी। हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा। आंदोलन आगे बढ़ता और फैलता गया। सरकार आंदोलन को दबाने, कमजोर करने-तोड़ने के हर संभव प्रयास करती रही। इस क्रम में चार नवंबर 1974 को पटना में जेपी पर लाठी चली। सत्ता सचमुच बौरा गयी थी।
उसके बाद 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द करने के फैसले के बाद देश का वातावरण ही बदल गया। निश्चय ही आंदोलन के दबाव और देश में फैलते उसके प्रभाव के कारण ही इंदिरा गांधी पर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने का ऐसा दबाव पड़ा कि उन्होंने 25 जून की रात देश में इमरजेंसी लगा दी। जेपी सहित विपक्ष के लगभग तमाम नेता गिरफ्तार हो गये। उसके बाद जो हुआ, सब इतिहास में दर्ज है। लेकिन इमरजेंसी के दौरान जेल संघर्ष वाहिनी के प्रशिक्षण केंद्र बन गये। हमारी वैचारिक समझ साफ हुई और संकल्प मजबूत हुआ।
कहा गया कि वर्ष 1977 में केंद्र, फिर अनेक राज्यों में सत्ता तो बदली, फिर भी बहुत कुछ नहीं बदला। तब से अब तक देश-दुनिया में बहुत बदलाव हो चुका है, लेकिन इसे सकारात्मक नहीं कह सकते। बल्कि आज तो देश बेहद निराशाजनक दौर से गुजर रहा है। बिना घोषणा के तानाशाही के लक्षण दिखने लगे हैं।
गोष्ठी को जेपी आंदोलन में जेल गए आर के वर्मा, जेपी आंदोलनकारी अरूण किशोर, मनोज भारतीय, महावीर कुमार, अधिवक्ता मंजू लता, राजीव भूषण सहाय, शंकर महतो, अनिल कुमार, वंशी लाल साहू आदि ने संबोधित किया।
गोष्ठी में छात्र समीर कुमार, आशीष रंजन, अंकित कुमार झा आदि शामिल थे। गोष्ठी की अध्यक्षता अरूण किशोर व संचालन महावीर कुमार ने किया।
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