सारण के तमाम दुर्गा मंडपों में आज होगी माता शैलपुत्री की पूजा
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन 11 अक्टूबर को आदिशक्ति जगत जननी मां दुर्गा की प्रथम स्वरूपा मां शैलपुत्री का ब्रह्मलोक से भू-लोक (पृथ्वी लोक) पर नवग्रहों के अधिपति सूर्य के साथ आगमन हो रहा है। शास्त्रों में इस दिन को योग साधना का प्रारंभ दिवस माना गया है।
सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित बाबा हरिहरनाथ मंदिर न्यास के मुख्य अर्चक आचार्य सुशीलचंद्र शास्त्री का कहना है कि शास्त्रीय मान्यता है कि पर्वतराज हिमालय और मैना के तप से आदिशक्ति ने उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया, इसलिए वे शैलपुत्री कहलाईं। शैल का अर्थ पर्वत है। पूर्व जन्म में यही प्रजापति दक्ष की कन्या सती थीं, जो शिव की अर्धांगिनी हैं।
देवी भागवत पुराण में उनके स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥ अर्थात मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाली, वृषभ पर आरूढ़, त्रिशूल और कमल धारण करने वाली यशस्विनी शैलपुत्री भक्तों को मनोवांछित फल देती हैं।
ज्योतिष शास्त्र में इस प्रथम शक्ति का संबंध सूर्य ग्रह से माना गया है। जिन जातकों की कुंडली में सूर्य कमजोर हो, उनके लिए मां शैलपुत्री की उपासना विशेष फलदायी है। योग शास्त्र के अनुसार प्रथमं शैलपुत्री च। प्रथम पूजा में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं, यहीं से योग साधना का शुभारंभ होता है। मूलाधार को स्थिरता और आरोग्य का आधार माना गया है। उन्होंने बताया कि मान्यता है कि मां शैलपुत्री की आराधना से स्थिरता, आरोग्य, भूमि-भवन और सौभाग्य की प्राप्ति होती है और प्रथम दिन विधिवत पूजा से पूरे नौ दिन की पूजा का फल मिलता है।
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