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ओबीसी की जातीय गिनती: अलग कॉलम नहीं तो सामाजिक न्याय अधूरा-नायक

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग की वास्तविक स्थिति को पहचानना और उसके अनुरूप न्यायपूर्ण नीतियां बनाना भी है। इसी संदर्भ में ओबीसी की जातीय जनगणना का सवाल आज देश के सामने एक महत्वपूर्ण सामाजिक और संवैधानिक प्रश्न बनकर खड़ा है। उक्त उदगार 15 सितंबर को झारखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने व्यक्त की।

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता नायक के अनुसार देश में अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी बहुत बड़ी है, लेकिन विडंबना यह है कि आज भी उसके बारे में समग्र, अद्यतन और विस्तृत आधिकारिक आंकड़े पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं। कहा कि जब किसी समाज की वास्तविक संख्या, सामाजिक स्थिति, शैक्षणिक स्थिति और आर्थिक भागीदारी के प्रमाणिक आंकड़े ही स्पष्ट नहीं होंगे, तो उसके लिए बनाई जाने वाली नीतियों का आधार क्या होगा? यही कारण है कि जातीय जनगणना में ओबीसी के लिए स्पष्ट एवं पृथक कॉलम की मांग महत्वपूर्ण है।

नायक ने कहा कि यह सवाल किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि पूरे समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था का है। सरकार देश की जनसंख्या, आर्थिक गतिविधियों, शिक्षा, रोजगार और विभिन्न सामाजिक समूहों से संबंधित अनेक प्रकार के आंकड़े जुटाती है। फिर ओबीसी समाज की वास्तविक सामाजिक संरचना और संख्या का प्रमाणिक आंकड़ा जुटाने को लेकर इतनी झिझक क्यों? कहा कि आंकड़े किसी समाज को बांटने के लिए नहीं, बल्कि उसे समझने के लिए होते हैं। यदि पता ही नहीं होगा कि विभिन्न पिछड़े समुदायों की संख्या कितनी है, उनकी शिक्षा और रोजगार की स्थिति क्या है तथा सरकारी संस्थानों में उनका प्रतिनिधित्व कितना है, तो सामाजिक न्याय की योजनाओं को प्रभावी ढंग से कैसे बनाया और लागू किया जाएगा? बिना आंकड़ों के सामाजिक न्याय की चर्चा अधूरी है।

नायक ने कहा कि ओबीसी को केवल एक प्रशासनिक श्रेणी के रूप में देखने से समस्या का समाधान नहीं होगा। ओबीसी के अंतर्गत अनेक जातियां और समुदाय आते हैं। उनके बीच सामाजिक, शैक्षणिक तथा आर्थिक स्थिति में काफी अंतर हो सकता है। जातीय आंकड़े उपलब्ध होने पर सरकार यह बेहतर ढंग से समझ सकती है कि कौन-से समुदाय शिक्षा में पीछे हैं, कौन रोजगार में पिछड़े हैं, किन वर्गों तक सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच रहा है और किन समुदायों को अतिरिक्त नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है। इसलिए अलग कॉलम का मतलब केवल संख्या गिनना नहीं है। इसका मतलब समाज के उन हिस्सों को आंकड़ों में दिखाई देना, जो लंबे समय से अपनी वास्तविक हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि देश का संविधान समानता और सामाजिक न्याय की बुनियाद पर खड़ा है। अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15(4) और 15(5) सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों का संवैधानिक आधार प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 16(4) राज्य को ऐसे पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण संबंधी प्रावधान करने की अनुमति देता है, जो राज्य की राय में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं रखते। कहा कि संविधान का अनुच्छेद 340 पिछड़े वर्गों की स्थिति की जांच के लिए आयोग की व्यवस्था करता है।

जब संविधान स्वयं पिछड़े वर्गों की सामाजिक स्थिति और प्रतिनिधित्व को महत्व देता है, तब उनके संबंध में विश्वसनीय आंकड़ों की मांग को गलत कैसे कहा जा सकता है? सही आंकड़े सामाजिक न्याय के विरोधी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के सबसे मजबूत आधार हैं। नायक ने कहा कि जातीय जनगणना की मांग को अक्सर जातिवाद बढ़ाने वाली मांग के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है। यह तर्क वास्तविक समस्या से ध्यान हटाता है। जाति भारतीय समाज की एक सामाजिक वास्तविकता है। इस वास्तविकता को आंकड़ों में दर्ज करने से वह पैदा नहीं होती। बल्कि, प्रमाणिक आंकड़े सामने आने से सरकार को यह समझने में मदद मिलती है कि सामाजिक असमानता कहां और कितनी है।

समस्या को आंकड़ों में दर्ज करना समस्या पैदा करना नहीं है। समस्या को छिपाना समाधान नहीं है। उन्होंने कहा कि आज ओबीसी समाज का सवाल केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है। सवाल शिक्षा में अवसर का है, सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व का है, राजनीतिक भागीदारी का है, आर्थिक संसाधनों तक पहुंच का है और विकास की मुख्यधारा में सम्मानजनक हिस्सेदारी का है। कहा कि यदि देश में नीतियां सबके लिए हैं, तो उन नीतियों के निर्माण में समाज के सभी वर्गों की वास्तविक स्थिति का ज्ञान भी होना चाहिए।

इसीलिए जातीय जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद उनका वैज्ञानिक विश्लेषण होना चाहिए और उसके आधार पर सामाजिक एवं आर्थिक नीतियों की समीक्षा की जानी चाहिए।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने सामाजिक न्याय और जातीय जनगणना के सवाल को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रखने की दिशा में लगातार आवाज उठाई है। राहुल गांधी सहित कांग्रेस नेतृत्व ने जातीय जनगणना और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर देश में व्यापक बहस खड़ी की है। यह बहस केवल सत्ता और विपक्ष की राजनीति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसे देश के उन करोड़ों देशवासियों की आकांक्षाओं से जोड़कर देखना चाहिए, जो चाहते हैं कि उनके सामाजिक और आर्थिक अधिकारों का निर्धारण वास्तविक आंकड़ों के आधार पर हो।

केंद्र सरकार को अब स्पष्ट जवाब देना चाहिए

प्रदेश प्रवक्ता नायक ने कहा कि केंद्र सरकार को यह बताना चाहिए कि यदि ओबीसी समाज की वास्तविक स्थिति जानने के लिए प्रमाणिक आंकड़े उपलब्ध कराना लोकतांत्रिक शासन के लिए उपयोगी है, तो जातीय जनगणना में ओबीसी के लिए स्पष्ट कॉलम देने से परहेज क्यों? कहा कि देश यह जानना चाहता है कि जब आंकड़ों के आधार पर योजनाएं बनती हैं, बजट तय होता है और विकास की प्राथमिकताएं निर्धारित होती हैं, तब ओबीसी समाज की वास्तविक संख्या और सामाजिक स्थिति को आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दर्ज करने में हिचकिचाहट क्यों होनी चाहिए? यह किसी वर्ग के खिलाफ मांग नहीं है। यह एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक या सामान्य वर्ग के बीच संघर्ष पैदा करने की मांग नहीं है।

यह मांग केवल इतनी है कि भारत की सामाजिक वास्तविकता को ईमानदारी से दर्ज किया जाए और उसी के आधार पर न्यायपूर्ण नीतियां बनाई जाएं। कहा कि लोकतंत्र में सभी की आवाज महत्वपूर्ण है। लेकिन जिस समाज की वास्तविक संख्या और स्थिति ही स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं होगी, उसकी आवाज नीति-निर्माण की मेज तक कितनी मजबूती से पहुंचेगी, यह गंभीर सवाल है। इसलिए ओबीसी की जातीय जनगणना में अलग और स्पष्ट कॉलम केवल आंकड़ों की मांग नहीं है। यह पहचान, भागीदारी, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की मांग है। देश को अब अनुमान और राजनीतिक दावों से आगे बढ़ना होगा। पहले सही आंकड़े सामने आएं, फिर उन्हीं आंकड़ों के आधार पर नीति बने और हर वर्ग को उसकी सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति के अनुरूप न्याय मिले। यही लोकतंत्र और संविधान की वास्तविक भावना है। सामाजिक न्याय तभी मजबूत होगा, जब आंकड़ों में दिखेगा।

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