एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। हाल के महीनो में झारखंड में हाथी-मानव संघर्ष मानव समुदाय द्वारा विकास की दौड़, बिखरते जंगल और बढ़ती मानवीय असुरक्षा का व्यापक राष्ट्रीय संकट है। उक्त बाते वरिष्ठ कांग्रेस नेता विजय शंकर नायक ने 13 फरवरी को झारखंड की राजधानी रांची के हटीया स्थित अपने कार्यालय में कही।
उन्होंने कहा कि भारत में एशियाई हाथी केवल एक वन्यजीव प्रजाति नहीं है। यह भारतीय संस्कृति, आस्था और जैव विविधता की निरंतरता का प्रतीक है। प्राचीन शिलालेखों से लेकर लोककथाओं और धार्मिक प्रतीकों तक हाथी हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा रहा है। किंतु आधुनिक भारत की विकास यात्रा ने इस विराट जीव को उसके पारंपरिक आवास से विस्थापित कर दिया है। परिणामस्वरूप मानव-हाथी संघर्ष आज देश के कई राज्यों में गहराता संकट बन चुका है।
नायक ने कहा कि पूर्वी भारत का खनिज-समृद्ध राज्य झारखंड इस संघर्ष का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और चिंताजनक उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहाँ यह समस्या स्थानीय असुविधा भर नहीं रही, यह अब सामाजिक स्थिरता, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारिस्थितिकी और नीति-निर्माण की विश्वसनीयता से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बन चुकी है।
नायक ने बताया कि आंकड़ों से परे एक त्रासदी वन विभाग और विभिन्न स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार झारखंड में लगभग 650 से 750 जंगली हाथी विचरण करते हैं। ये हाथी मुख्यतः राज्य के दक्षिणी, मध्य और पश्चिमी वन क्षेत्रों में फैले हैं। पिछले एक दशक में 300 से अधिक झारखंडवासियों की मृत्यु हाथी-मानव संघर्ष में दर्ज की गई है। औसतन हर वर्ष 30 से 40 जंगल क्षेत्र में रह रहे रहिवासियों की जान चली जाती है। यदि राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो भारत में प्रति वर्ष लगभग 400 से 500 मानव मृत्यु हाथियों के साथ संघर्ष में होती हैं। यह आँकड़ा इस तथ्य को रेखांकित करता है कि समस्या केवल किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के विकास मॉडल और भूमि उपयोग नीति से गहराई से जुड़ी है। कहा कि झारखंड में हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि प्रतिवर्ष हाथियों के आक्रमण से प्रभावित होती है।
धान, मक्का, गन्ना और सब्ज़ी जैसी फसलें हाथियों को आकर्षित करती हैं। सैकड़ों कच्चे मकान जंगली हाथियों द्वारा ढाह दिए गये हैं। आर्थिक नुकसान की वास्तविक राशि सरकारी मुआवजा आंकड़ों से कहीं अधिक है, क्योंकि अनेक घटनाएँ दर्ज ही नहीं हो पाता है। नायक ने बताया कि भौगोलिक परिदृश्य से देखे तो संघर्ष के केंद्र में झारखंड के कई जिले इस संकट के प्रत्यक्ष गवाह हैं। राजधानी रांची के ग्रामीण अंचलों से लेकर खूंटी और गुमला के वन क्षेत्रों तक हाथियों की आवाजाही और मानव बस्तियों का फैलाव एक-दूसरे से टकरा रहे हैं। इसके अलावा राज्य के लोहरदगा, हजारीबाग और बोकारो जैसे क्षेत्रों में वन विखंडन और रेल मार्गों की उपस्थिति ने जोखिम बढ़ाया है।
कई बार रेल दुर्घटनाओं में हाथियों की मृत्यु हुई है, जो इस संघर्ष की दूसरी त्रासदी को उजागर करती है। सूखा-प्रवण पलामू में जल स्रोतों की कमी हाथियों को मानव बस्तियों की ओर धकेलती है। वहीं खनिज संपदा से समृद्ध पूर्वी सिहभूम, पश्चिमी सिहभूम और सराइकेला- खरसावाँ में खनन गतिविधियों ने जंगलों को खंडित कर दिया है। ये सभी जिले ऐतिहासिक हाथी कॉरिडोर का हिस्सा रहे हैं, जो झारखंड को ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ से जोड़ते हैं। जब ये कॉरिडोर बाधित होते हैं, तो हाथी वैकल्पिक रास्तों की तलाश में गाँवों और खेतों की ओर मुड़ते हैं।
नायक के अनुसार संघर्ष की जड़ें विकास और पारिस्थितिकी का असंतुलन है। इसके तहत वन क्षेत्र का क्षरण, खनन, सड़क निर्माण, औद्योगिक परियोजनाएँ और अवैध अतिक्रमण ने राज्य के वन क्षेत्र को खंडित कर दिया है। खुली खदानों ने भूमि की संरचना बदली है और प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली को प्रभावित किया है। हाथी कॉरिडोर का अवरोध ऐतिहासिक प्रवासी मार्गों पर बस्तियाँ, रेलवे लाइनें और राजमार्ग बन गए। हाथियों की स्मृति और प्रवास पद्धति पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होती है, जब ये मार्ग बंद होते हैं, तो संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है। जलवायु परिवर्तन और जल संकट अनियमित वर्षा और बढ़ती गर्मी ने जल स्रोतों को प्रभावित किया है। जंगलों में जल की कमी हाथियों को खेतों और तालाबों की ओर आकर्षित करती है।
कृषि पैटर्न में बदलाव के तहत धान और मक्का जैसी ऊर्जा-समृद्ध फसलें हाथियों को आकर्षित करती हैं। एकल फसल प्रणाली (मोनोक्रॉपिंग) ने जोखिम को और बढ़ाया है। ग्रामीण आबादी का विस्तार वन सीमांत क्षेत्रों तक हो चुका है। भूमि उपयोग में यह परिवर्तन संघर्ष की तीव्रता को बढ़ाता है। सामाजिक और आर्थिक प्रभाव हाथी-मानव संघर्ष का सबसे बड़ा भार छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ता है।
नायक के अनुसार फसल नष्ट होने पर किसान कर्ज़ में डूब जाते हैं। रात भर पहरा देना, लगातार भय में जीना मानसिक तनाव का मुख्य कारण है। जिसके कारण शिक्षा के प्रसार पर इसका असर पड़ता है। कई गाँवों में बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। कहा कि झारखंड के कुछ क्षेत्रों में परिवार सुरक्षित स्थानों की ओर जा रहे हैं। इस दौरान बिजली के करंट, रेल दुर्घटना और प्रतिशोधात्मक जहर से हाथियों की भी जान जाती है। यह संघर्ष दोनों पक्षों के लिए घातक है। मानव और वन्यजीव दोनों इसकी कीमत चुका रहे हैं।
कहा कि राज्य सरकार ने मुआवजा योजना, सोलर फेंसिंग, रैपिड रिस्पांस टीम और हाथी ट्रैकिंग जैसे कदम उठाए हैं। लेकिन कई चुनौतियाँ सामने हैं जिनमें मुआवजा भुगतान में विलंब, अपर्याप्त बजट, तकनीकी निगरानी सीमित, अंतर-राज्यीय समन्वय का अभाव मुआवजा यदि समय पर नहीं मिले, तो ग्रामीणों में असंतोष बढ़ता है। वे प्रतिशोधात्मक कदम उठाने लगते हैं। रेल और अवसंरचना हाथियों के लिए अदृश्य खतरा है। हाथियों के मार्गों को काटती रेल लाइनें एक गंभीर समस्या हैं। गति नियंत्रण, चेतावनी प्रणाली और अंडरपास जैसे उपाय पर्याप्त रूप से लागू नहीं हैं।
यह दर्शाता है कि अवसंरचनात्मक योजना में वन्यजीव संरक्षण को अभी भी प्राथमिकता नहीं दी गई। झारखंड की स्थिति यह स्पष्ट करती है कि यदि विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो संघर्ष और बढ़ेगा। देश के लगभग 60 प्रतिशत हाथी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर विचरण करते हैं। इसका अर्थ है कि भूमि उपयोग नीति और क्षेत्रीय योजना में वन्यजीव कॉरिडोर को शामिल करना अनिवार्य है। कहा कि अनुभव बताता है कि जब विकास पारिस्थितिक संतुलन से अलग होकर आगे बढ़ता है, तो सामाजिक लागत बढ़ जाती है।
खनन और औद्योगिक परियोजनाएँ आवश्यक हो सकती हैं, लेकिन यदि वे वन्यजीव आवास और कॉरिडोर को नष्ट कर दें, तो दीर्घकालिक परिणाम विनाशकारी होते हैं। हाथी गाँव में नहीं आए बल्कि मनुष्य उनके जंगल में गया। निष्कर्ष यह कि हाथी-मानव संघर्ष केवल वन्यजीव संरक्षण का प्रश्न नहीं है। यह मानवीय सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सतत विकास की परीक्षा है। यदि विज्ञान-आधारित, समुदाय-केंद्रित और समन्वित नीति अभी लागू नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहराएगा। अवसर इस बात का कि हम विकास और पारिस्थितिकी के बीच संतुलन की नई परिभाषा गढ़ें। यह समय है यह स्वीकार करने का कि प्रकृति के साथ संघर्ष में अंततः हार मनुष्य की ही होती है। समाधान सह-अस्तित्व में है, संतुलन में है, और दूरदर्शी नीति में है।
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