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भगवान केवल भाव के भूखे हैं; कृष्ण-सुदामा प्रसंग से सच्ची मित्रता का दिव्य संदेश

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित श्रीराधा-कृष्ण मंदिर के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सातवें और अंतिम दिन 13 सितंबर की रात्रि में भव्य समापन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। वृंदावन धाम से पधारे प्रख्यात कथा प्रवक्ता, भागवत रत्न आचार्य श्रीसुमंत कृष्ण शास्त्री उर्फ कन्हैयाजी महाराज ने कथा के सप्तम दिवस पर अब तक कही गई समस्त भागवत कथाओं का सार बताते हुए श्रीकृष्ण-सुदामा के अलौकिक प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया।

उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण का श्रीकृष्ण-सुदामा प्रसंग निःस्वार्थ प्रेम, अटूट विश्वास और सच्ची मित्रता का सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण है। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने भक्तों को जीवन के सात दिव्य सूत्र प्रदान किए।
कहा कि यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची मित्रता में राजा-रंक और अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होता, क्योंकि संबंध आत्मा से जुड़ते हैं, शरीर या संपत्ति से नहीं। कहा कि द्वारकाधीश श्रीकृष्ण द्वारा अपने मित्र सुदामा को सिंहासन पर बैठाना और अपने आंसुओं से उनके चरण धोना यह दर्शाता है कि सच्चा मित्र हर सम्मान का अधिकारी है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सुदामा के संकोच को भांपकर उनकी फटी हुई पोटली से चावल को प्रेमपूर्वक खाना यह प्रमाणित करता है कि प्रभु को वस्तु नहीं, केवल भाव चाहिए। वे केवल प्रेम के भूखे हैं।

सुदामा का बिना कुछ मांगे अपने मित्र के पास जाना यह सिखाता है कि सच्चे प्रेम में कोई अपेक्षा या स्वार्थ की भावना नहीं होती। अंतर्यामी कृष्ण ने बिना मांगे ही सुदामा को सब कुछ दे दिया। यह संदेश देता है कि सच्चे मित्र और निष्काम भक्त की आवश्यकता को ईश्वर स्वयं ही पूर्ण कर देते हैं।
महाराजजी ने कहा कि आज के इस भौतिकवादी और स्वार्थी युग में यह प्रसंग उपयोगितावादी रिश्तों पर करारा प्रहार करता है। यह सिखाता है कि संबंध फायदे से परे होने चाहिए।

आधुनिक जीवन के तनाव और अकेलेपन के दौर में सुदामा जैसा एक भी निष्कपट मित्र होना मानसिक शांति और संबल प्रदान कर सकता है। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग समाज में आर्थिक और वर्ग-भेद की दूरियों को मिटाकर सामाजिक समरसता और समानता स्थापित करने का महान आदर्श प्रस्तुत करता है। विपरीत परिस्थितियों में भी संतोष और धैर्य बनाए रखने वाले सुदामा का चरित्र आज की युवा पीढ़ी को जीवन में कृतज्ञता और संतोष का पाठ पढ़ाता है।

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