फर्जी कागजात और पुनर्वास पर्चे के सहारे जमीन बेचने का काला खेल
रैयतों का आरोप; मुआवजा नहीं, पुनर्वास नहीं, जमीन पर कैसे जारी हो रहे पर्चे
रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। बोकारो जिला के हद में जरीडीह अंचल के जैनामोड़ और आसपास के इलाकों में खतियानी रैयती जमीनों को लेकर कथित फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है। रैयतों का आरोप है कि दलालों और दबंग तत्वों द्वारा कथित फर्जी कागजात तैयार कर जमीन पर कब्जा करने और उसे गैर-विस्थापितो के हाथों बेचने का काला खेल बदस्तूर जारी है।
मामले में सरकारी तंत्र के कई अधिकारियों और प्रभावशाली सफेदपोश की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
मामला जरीडीह अंचल के जैना मौजा से जुड़ा बताया जा रहा है। रैयत जयसिंह किस्कु एवं रूपू कुमारी के अनुसार खतियानी जमीन खाता नंबर-7 के 13 प्लॉटों में कुल 9.39 डिसमिल जमीन दर्ज है।
इनमें से लगभग 1.76 डिसमिल जमीन का वर्तमान में रसीद कट रहा है और रैयतों का कब्जा बताया जा रहा है। रैयतों का दावा है कि शेष जमीन को वर्ष 1962-63 में बीएसएल द्वारा पुनर्वास के उद्देश्य से अधिग्रहित बताया जाता है। दस्तावेजों के अनुसार, प्लॉट नंबर 231 की 1.15 डिसमिल जमीन के लिए 241 रुपये मुआवजा दिए जाने का उल्लेख है। संबंधित मामला अवार्ड नंबर-34 एवं एलए केस नंबर-530/62-63 बताया गया है।
रैयतों का गंभीर आरोप है कि अधिग्रहण के बावजूद अन्य प्लॉटों का मुआवजा अब तक नहीं दिया गया और न ही संबंधित जमीन पर किसी को पुनर्वासित किया गया। इसके बावजूद अब इन जमीनों पर कथित तौर पर फर्जी पुनर्वास पर्चे तैयार कर अनधिकृत को बसाने और उन्हीं कागजात के आधार पर जमीन की खरीद-बिक्री कराने का प्रयास किया जा रहा है।
रैयतों का आरोप है कि कथित फर्जी पर्चों को आधार बनाकर जमीन गैर-विस्थापित समेत अन्य के हाथों बेची जा रही है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह न केवल जमीन के स्वामित्व बल्कि सरकारी रिकॉर्ड और पुनर्वास व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
मामले को लेकर उपायुक्त बोकारो, अंचल अधिकारी जरिडीह, डीपीएलआर बोकारो और बीएसएल प्रबंधन को शिकायत दिए जाने की बात कही गई है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि बार-बार शिकायत के बावजूद अब तक मामले में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है।
झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के बोकारो जिलाध्यक्ष अमरेश कुमार महतो ने 29 सितंबर को उक्त मामले को गंभीर बताते हुए कथित जमीन फर्जीवाड़े की तत्काल जांच और जमीन की खरीद-बिक्री पर रोक लगाने की मांग की है। जेएलकेएम जिलाध्यक्ष महतो ने आरोप लगाया कि बीएसएल, पुनर्वास से जुड़े कार्यालय, भू-अर्जन पदाधिकारी और स्थानीय अंचल कार्यालय की मिलीभगत के बिना इस तरह का खेल संभव नहीं है।
उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी है कि यदि कथित फर्जीवाड़े और जमीन की खरीद-बिक्री पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई तो जेएलकेएम आंदोलन का रास्ता अपनाएगा। बड़ा सवाल यह है कि जिस जमीन का मुआवजा और पुनर्वास प्रक्रिया खुद विवादों में है, उस पर कथित पुनर्वास पर्चे जारी करने का आधार क्या है? आखिर इन पर्चों को किसके आदेश पर और किन दस्तावेजों के आधार पर तैयार किया गया? और यदि जमीन वास्तव में खतियानी रैयती है, तो उसकी खरीद-बिक्री का अधिकार किस आधार पर दिया जा रहा है? इन सवालों के जवाब प्रशासनिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।
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