नवरात्र के बाद बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा पर्व संपन्न
नंद कुमार सिंह/फुसरो (बोकारो)। बेरमो कोयलांचल में इस बार भले ही कोरोना के बावजूद दुर्गा पूजा में भीड़ दिखी। दशहरे में मेले का आयोजन (Organizing a fair) नहीं किया जा सका। इसके बावजूद 15 अक्टूबर को विजयादशमी के अवसर पर महिलाओं ने परंपरा के अनुसार मां दुर्गे की विदाई के पहले सिंदूर होली खेली।
नवरात्र के बाद बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा पर्व धूमधाम से मनाया गया। नौ दिन तक दुविसर्जन पूजा के साथ ही महिलाओं ने सिंदूर खेलकर विजयदशमी मनाई। शहर में दुर्गा पूजा के दौरान कई जगहों पर बड़े-बड़े पंडाल बनाए जाते हैं, लेकिन इस बार पंडाल का निर्माण नहीं हुआ।
न ही मेले का आयोजन किया गया। ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा साल में एक बार अपने मायके आती हैं। जितने दिन तक मां मायके में रुकती हैं, उसे दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि मां दुर्गा मायके से विदा होकर जब ससुराल जाती हैं, तो सिंदूर से उनकी मांग भरी जाती है। साथ ही दुर्गा मां को पान और मिठाई भी खिलाये जाते हैं।
हिंदू धर्म में एक मान्यता के अनुसार सिंदूर का बहुत बड़ा महत्व होता है। सिंदूर को महिलाओं के सुहाग की निशानी कहते हैं। सिंदूर को मां दुर्गा के शादी शुदा होने का प्रतीक माना जाता है। इसलिए नवरात्रि पर सभी शादी शुदा महिलाएं एक दूसरे को सिंदूर लगाती है।
विजयादशमी के अवसर पर कड़ी सुरक्षा के बीच क्षेत्र के सभी प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया। प्रतिमा विसर्जन से पहले पंडालों में नम आंखों से देवी दुर्गा को विदाई दी गई। कहीं सिंदूर की होली खेली गई, तो कहीं देवी बहनों का खोंइंछा मिलन कराया गया।
जय माता दी के जयकारे से फिजा भक्तिमय हो गया। फूलों की वर्षा के बीच आस्था की सरिता में गोते लगा रहे भक्त मां के अंतिम दर्शन कर उनके चरण स्पर्श को बेताब दिखे।
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