कभी महात्मा बुद्ध ने इस मही नदी किनारे किया था विश्राम
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। जहां एक ओर इस मानसून के मौसम में बिहार की गंगा, गंडक एवं अन्य नदियों के जल स्तर में वृद्धि हो रही है। वहीं सारण जिला के हद में सोनपुर इलाके में बहनेवाली मही नदी की तलहटी में एक बूंद पानी नहीं है। इस ऐतिहासिक नदी के किनारे कभी महात्मा बुद्ध ने धनिय नामक ग्वाले की मड़ई में विश्राम किया था।
बताया जाता है कि आजकल यह नदी जलधारा व् बर्षाजल के अभाव में पुरी तरह सूख गयी है। एक – एक बूंद पानी के लिए तरस रही है। सरकार की नदी बचाओ अभियान यहां फेल है।
सोनपुर स्थित काली घाट के दक्षिण मही नदी का मुहाना जहां नारायणी नदी से संगम होता है, यहां नदी का मार्ग काफी संकरा हो गया है। मुहाने की साफ -सफाई नहीं हुई है। पर हरिहरनाथ मंदिर से पश्चिम की ओर यह नदी का मार्ग बढ़ता जाता है। इसकी चौड़ाई दिखाई पड़ने लगती है। पूर्णतः सुखी पड़ी इस नदी के किनारे के ऊंचे भागों पर अनेक दबंगो ने अनाधिकृत कब्जा कर खेती योग्य बना लिया है। कई स्थानों पर नदी के बीच से अवैध रुप से मिट्टी का उत्खनन कर धंधेबाजों ने मही नदी का स्वरुप ही बिगाड़ दिया है। ऊबड़ – खाबड़ नदी का यह मार्ग अब सौन्दर्यविहीन हो चुका है।
ज्ञात हो कि यह नदी कभी स्थानीय मछुआरों के लिए जीविकोपार्जन का बहुत बड़ा श्रोत हुआ करता था। यही कारण है कि इस सूखी नदी के दोनों तरफ मल्लाहों के अनेक गांव स्थित है। साल में छह माह तक सूखी रहनेवाली इस नदी में अब बाढ़ के दौरान ही पानी का आगमन होता है। तब इन मछुआरों के नाव और जाल भी दिखते हैं। शेष माह सूखी नदी में नाव फंसकर बर्बाद हो जाते हैं। नदी में पानी नहीं रहने और नारायणी नदी से इस नदी का संपर्क टूट जाने से कई नौकाएं सड़ रही हैं।
सरकारी लोअर बैलहट्टा मही नदी के किनारे ही अवस्थित है। राहर दियारा नजरमीरा बिंद टोली के निकट भी मही नदी की जमीनों पर अतिक्रमण किया गया है। इससे आगे बढ़ने पर मही नदी की भूमि का अतिक्रमण बढ़ता गया है। अब सबकी नजर हरिहरनाथ मंदिर क्षेत्र कॉरिडोर के विकास पर है। ऐसा बताया जा रहा है कि जैसे – जैसे हरिहरक्षेत्र कॉरिडोर का कार्य आगे बढ़ेगा सरकारी जमीन अतिक्रमण से मुक्त कराने का सिलसिला भी शुरु हो जायेगा।
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