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रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत पर कब्जे को लेकर चाचा भतीजे में जंग

गंगोत्री प्रसाद सिंह/हाजीपुर (वैशाली)। पूर्व केंद्रीय मंत्री और लोजपा के संस्थापक पद्मविभूषण दिवंगत रामविलास पासवान ने अपने संसदीय जीवन की शरुआत वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव में हाजीपुर संसदीय क्षेत्र से रिकार्ड मतों से विजय प्राप्त कर की थी। दो टर्म को छोड़कर रामविलास पासवान लगातार हाजीपुर के सांसद और केंद्र सरकार में ताकतवर मंत्री रहे, चाहे सरकार यूपीए की रही हो या एनडीए की रही हो।

वर्ष 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद लगातार केंद्र में अपनी मृत्यु तक वे मंत्री रहे। बिहार में उनके समुदाय पासवान जाती की लगभग 6 प्रतिशत मत में भागीदारी रही है, जिसके वे एकमात्र नेता रहे।

रामविलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना की औऱ वर्ष 2019 के संसदीय चुनाव में उनके दल के 6 सांसद विजयी हुये। राज्य सभा के सदस्य बनने पर हाजीपुर से उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने भाई पशुपति पारस को टिकट दिया और पारस मोदी के नाम पर बिना क्षेत्र में वोट मांगे हाजीपुर के सांसद बन गए।

लेकिन रामविलास पासवान के मरते ही मंत्री पारस का अपने भतीजे चिराग पासवान (सांसद जमुई) से विवाद हो गया और लोजपा के 6 में से 5 सांसदों को अपने पाले में कर पशुपति मोदी सरकार में मंत्री बनने में सफल रहे।

दिवंगत रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान ने गत दो वर्षों में अपनी मेहनत से अपने पिता की राजनीतिक विरासत को प्राप्त कर लिया है और चिराग ने हाजीपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। जिससे चाचा पशुपति पारस तिलमिला गए हैं। क्षेत्र में अब इनकी सक्रियता भी बढ़ गई है। बीते 18 जुलाई को दिल्ली में हुये एनडीए गठबंधन की बैठक में चिराग पासवान के शामिल होने और मोदी से गले मिलने के बाद स्पष्ट हो गया है कि चिराग पासवान अपने पिता की राजनीतिक विरासत को पाने में सफल रहे है।

हाजीपुर के स्थानीय भाजपा और लोजपा कार्यकर्ताओं के बीच अब आम चर्चा हो रही है कि अब चाचा का क्या होगा। वैसे भाजपा के नेता और कार्यकर्ता चिराग पासवान के समर्थन में है और कयास लगाया जा रहे है कि चिराग की मोदी मंत्री मंडल में जल्द इंट्री होगी और चाचा 2024 में बेपथ्य में जायेंगे।

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